पृष्ठ:निर्मला.djvu/२३३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
निर्मला
२३०
 

निर्मला ने चिढ़ कर कहा-एक बार में तो तेरा काम ही कभी नहीं होता। वहाँ छोड़ कर और जायगा कहाँ? आलमारी में देखा था?

भुङ्गी-नहीं बहू जी,आलमारी में तो नहीं देखा,झूठ क्यों बोलूँँ। '

निर्मला मुस्करा पड़ी। बोली-जा देख, जल्दी आ। एक क्षण में भुङ्गी फिर खाली हाथ लौट आई-आलमारी में भी तो नहीं है। अब जहाँ बताओ,वहाँ देखूँ।

निर्मला झुँझला कर यह कहती हुई उठ खड़ी हुई-तुझे ईश्वर ने आँखें ही न जाने किसलिए दी। देख उसी कमरे में से लाती हूँ कि नहीं।

भुङ्गी भी पीछे-पीछे कमरे में गई। निर्मला ने ताक पर निगाह डाली,आलमारी खोल कर देखी,चारपाई के नीचे झाँक कर देखा, फिर कपड़ों का बड़ा सन्दूक खोल कर देखा। बक्स का कहीं पता नहीं। आश्चर्य हुआ-आखिर बक्स गया कहाँ?

सहसा रात वाली घटना बिजली की भाँति उसकी आँखों के सामने चमक गई। कलेजा उछल पड़ा। अब तक निश्चित होकर खोज रही थी। अब ताप सी चढ़ आई। बड़ी उतावली से चारों ओर खोजने लगी। कहीं पता नहीं। जहाँ खोजना चाहिए था,वहाँ भी खोजा; और जहाँ नहीं खोजना चाहिए था,वहाँ भी खोजा। इतना बड़ा सन्दूकचा बिछावन के नीचे कैसे छिप जाता; पर बिछावन भी झाड़ कर देखा। क्षण-क्षण मुख की कान्ति मलिन