पृष्ठ:निर्मला.djvu/२५५

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निर्मला
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रोना सुन कर मुझे पीटने लगते। अन्त को मैं एक दिन घर से निकल खड़ा हुआ।

सियाराम के मन में भी घर से निकल भागने का विचार कई बार हुआ था। इस समय भी उसके मन में यही विचार उठ रहा था। बड़ी उत्सुकता से बोला-घर से निकल कर आप कहाँ गए?

बाबा जी ने हँस कर कहा-उसी दिन मेरे सारे कष्टों का अन्त हो गया। जिस दिन घर के मोह-बन्धन से छूटा; और भय मन से निकला,उसी दिन मानो मेरा उद्धार हो गया। दिन भर तो मैं एक पुल के नीचे बैठा रहा। सन्ध्या समय मुझे एक महात्मा मिल गए। उनका नाम स्वामी परमानन्द जी था। वे बाल-ब्रह्मचारी थे। मुझ पर उन्होंने दया की, और अपने साथ रख लिया। उनके साथ मैं देश-देशान्तरों में घूमने लगा। वह बड़े अच्छे योगी थे। मुझे भी उन्होंने योग-विद्या सिखाई। अब तो मेरे को इतना अभ्यास हो गया है कि जब इच्छा होती है, माता जी के दर्शन कर लेता हूँ। उनसे बातें कर लेता हूँ।

सियाराम ने विस्फरित नेत्रों से देख कर पूछा-आपकी माता का तो देहान्त हो चुका था?

साधु-तो क्या हुआ बच्चा, योग-विद्या में यह शक्ति है कि जिस मृत-आत्मा को चाहे बुला ले।

सियाo-मैं योग-विद्या सीख लूं, तो मुझे भी माता जी के दर्शन होंगे?