पृष्ठ:निर्मला.djvu/२५६

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इक्कीसवाँ परिच्छेद
 

साधु-अवश्य! अभ्यास से सब कुछ हो सकता है। हॉ, योग्य गुरु चाहिए। योग से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। जितना धन चाहो,पलमात्र में मॅगा सकते हो। कैसी ही बीमारी हो,उसकी औषधि बता सकते हो।

सिया०-आपका स्थान कहाँ है?

साधु-बच्चा,मेरे को स्थान कहीं नहीं है। देश-देशान्तरों में रमता फिरता हूँ। अच्छा बच्चा,अव तुम जाव,मैं जरा स्नान-ध्यान करने जाऊँगा।

सिया-चलिए मैं भी उसी तरफ चलता हूँ। आपके दर्शनों से जी नहीं भरा।

साधु-नहीं वच्चा,तुम्हें पाठशाले जाने को देर हो रही है।

सिया-फिर आपके दर्शन कब होंगे?

साधु-कभी आ जाऊँगा वच्चा,तुम्हारा घर कहाँ है?

सियाराम प्रसन्न होकर बोला-चलिएगा मेरे घर;बहुत नज़दीक है। आपकी बड़ी कृपा होगी।

सियाराम कदम बढ़ा कर आगे-आगे चलने लगा। इतना प्रसन्न था, मानो सोने की गठरी लिए जाता हो। घर के सामने पहुँच कर बोला-आइए,वैठिए कुछ देर ।

साधु-नहीं वच्चा,बैलूंगा नहीं।फिर कल-परसों किसी समय आ जाऊँगा,यही तुम्हारा घर है?

सिया०-कले किस वक्त.आइएगा।

साधु-निश्चय नहीं कह सकता। किसी समय आ जाऊँगा।