पृष्ठ:निर्मला.djvu/२५७

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निर्मला
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साधु आगे बढ़े तो थोड़ी ही दूर पर उन्हें एक दूसरा साधु मिला। इसका नाम था हरिहरानन्द।

परमानन्द ने पूछा-कहाँ-कहाँ.की शैर की? कोई शिकार फँसा?

हरिहरानन्द-इधर तो चारों तरफ घूम आया,कोई शिकार न मिला। एकाध मिला भी तो मेरी हँसी उड़ाने लगा।

परमानन्द-मुझे तो एक मिलता हुआ जान पड़ता है। फंस जाय तो जानें।

हरिहरानन्द-तुम योंही कहा करते हो। जो आता है,दो-एक दिन के वाद निकल भागता है।

परमानन्द-अवकी भागेगा,देख लेना। इसकी माँ मर गई है। बाप ने दूसरा विवाह कर लिया है। माँ भी सताया करती है। घर से ऊबा हुआ है।

हरिहरानन्द-हाँ,यह मामला है तो अवश्य फंसेगा। लासा लगा दिया है न?

परमानन्द-खूब अच्छी तरह। यही तरकीब सबसे अच्छी है।पहले इसका पता लगा लेना चाहिए कि मुहल्ले में किन-किन घरों में विमाताएँ हैं। उन्हीं घरों में फन्दा डालना चाहिए।