27. MAULA ON THE EFACEMENT, IN ECSTACY,
OF THE DISTINCTION BETWEEN
SELF AND GOD.
जो पीर मेरा बड़ा औलिया, निशान बतलाया ।
उससे मैंने गुङ्ग होकर, अपना घर पाया ॥ १ ॥
पञ्चतत्व के मकान में म ही बैठा रहा ।
तरह तरह का रंग देख कर, बाजा सुन लिया ॥ २ ॥
'ततु त्वं' शब्द का बोल बताया, होशियार मैं हुआ ।
नाद विन्दु की कला जानकर, हुआ बेपरवा ॥ ३ ॥
लाल शून्य के ऊपर सफेद शून्य दिखलाया ।
उस पर काला तीसर शून्य सुषुप्ति कहलाया ॥ ४ ॥
चौथे शून्य का बड़ा उजियारा, गुरु ने बतलाया।
उन्मनि मैंने साँइ जगाया, उसे समुझि लिया ॥ ५ ॥
आनन्द नहाया बन्दा खुदा, दोनो बिसर गया ।
बेनाम का नाम होकर, रहटाना राहा ॥ ६ ॥
और भी यह समुझि ले, पूर्णब्रह्म कैसोई ।
समझे लाल सफेद पर काला, जो देखे नीला सोई ॥ ७ ॥
कहे मौलाई समुझि ले, जो मुरशिद को पाई ।
प्याला लेवे जाने वाहिद, जान पाई ॥ ८ ॥