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पृष्ठ:परमार्थ-सोपान.pdf/७०

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[ Part I Ch. 1
परमार्थसोपान


6. GOD IMPLORED FOR DELIVERANCE
FROM APPEARANCE AND SIN



कीजै प्रभु अपने बिरद की लाज ॥ टे ॥

महा-पतित कबहूँ नहिं आयौं,
नैकु तिहारे काज ॥ १ ॥

माया सबल धाम धन वनिता,
बाँध्यो हौं इहि ँसाज ॥ २ ॥

देखत सुनत सबै जानत हौं ँ,
तऊ न आयौ ँवाज ॥ ३ ॥

कहियत पतित बहुत तुम तारे,
स्रवननि सुनी अवाज ॥ ४ ॥

दइ न जात केवट-उतराई,
चाहत चढ्यौ जहाज ॥ ५ ॥

नई न करन कहत प्रभु तुम हौ,
सदा गरीब निवाज ॥ ६ ॥

लीजै पार उतारि सूर कौं
महाराज व्रजराज ॥ ७ ॥