पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/१६

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
परीक्षा गुरु
 

ते ही बड़े घन्टे की तरफ़ देख कर कहा. परन्तु ये उसकी चालाकी थी उसने ब्रजकिशोर से पीछा छुड़ाने के लिये अपनी घड़ी में चाबी देने के बहाने से आधे घन्टे आगे कर दी थी!


“कदाचित् ये घंटा आधे घंटे पीछे हो" मिस्टर शिंभूदयाल ने बात साध कर कहा.


"नहीं,नहीं ये घन्टा तोप से मिला हुआ है” लाला मदनमोहन बोले.

"तो लाला ब्रजकिशोर साहब की लच्छेदार बातें नाहक अधूरी रह गई?” मुन्शी चुन्नीलाल ने कहा.


“लाला ब्रजकिशोर की बातें क्या हैं चकाबू का जाल है वह चाहते हैं कि कोई उनके चक्कर से बाहर न निकलने पाए मास्टर शिंभूदयाल ने कहा.


"मैं यों तो ये कांच लेता या न लेता पर अब उनकी जिद से अद्-बद् कर लूँगा.

"निस्सन्देह जब वे अपनी ज़िद नहीं छोड़ते तो आपको अपनी बात हारनी क्या जरूर है?” मुन्शी चुन्नीलाल ने छींटा दिया.


हितोपदेश में कहा है "आज्ञालोपी सुतहु कों क्षमै न नृपति बिनीत॥ को विशेष नृप, चित्रमैं " जो न गहे यह रीति"॥ * पंडित पुरुषोत्तमदास ने मिल्ती में मिलाकर कहा.


“बहुत पढ़ने लिखने से भी आदमी की बुद्धि कुछ ऐसी निर्बल हो जाती है कि बड़े-बड़े फिलासफर छोटी बात में चक्कर खाने लगते हैं" मास्टर शिंभूदयाल कहने लगे. "सर आइज़ैक न्यूटन


  • आज्ञा भंगकरान राजा न क्षेत्र सुतानपि. विशेषह कौन राज्ञय राज्ञ श्रृच्त्नगतस्य च..