पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/२१८

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
परीक्षागुरु.
२०८
 

तरह शतरंज मैं एक, एक चाल चलनेंसै बाज़ीका नक्‌शा पलटता जाता है इसी तरह संसार मैं हरेक बात मैं काम काज की रीति भांति बदलती रहती है अबतक यह समझता था कि मुझको मदनमोहनसै अवश्य इन्साफ मिलेगा परंतु वह समय निकल गया अब मैं फ़ायदा उठाऊं या न उठाऊं मदनमोहन को फ़ायदा पहुंचाना सहज नहीं. मेरा हाल तुम अच्छी तरह जान्ते हो मैं केवल अपनी हिम्मत के सहारे सब तरह का दुःख झेल रहा हूँ परन्तु मेरे कर्तव्य काम मुझको ज़रा भी नहीं उभरने देते. कहते हैं कि अत्यंत बिपत्तिकाल मैं महर्षि बिश्वामित्र ने भी चंडाल के घर सै कुत्ते का मांस चुराया था! फिर मैं क्या करूं? क्या न करूं कुछ बुद्धि काम नहीं करती"

"समय बीते पीछै आप इन सब बातों की याद करते हैं अब तो जो होना था हो चुका यदि आप पहले इन बातों को बिचार करते तो केबल आप को ही नहीं आप के कारण हम लोगों को भी बहुत कुछ फ़ायदा हो जाता"

"तुम अपने फ़ायदे के लिये तो बृथा खेद करते हो!" लाला ब्रजकिशोर ने हंस कर जवाब दिया "अलबत्ता मैं मदनमोहन सै साफ़ जवाब पाए बिना कुछ नहीं कर सक्ता था क्योंकि मुझ को प्रतिज्ञा भग करना मंजूर न था क्या तुम को मेरी तरफ सै अब तक कुछ संदेह है?"

"जी नहीं, आप की तरफ़ का तो मुझ को कुछ संदेह नहीं है परन्तु इतना ही विचार है कि खल मैं सै तेल आप किस तरह निकालैंगे!" मुन्शी चुन्नीलाल ने जीमैं संदेह कर के कहा.