पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/२५८

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परीक्षागुरू.
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लाला मदनमोहन भोजन करके आए उस्तमय मुन्शी चुन्नीलालनें अपनें मतलब की बात छेड़ी।

"मुझको हर बार अर्ज करनेंमै बड़ी लज्जा आती है परन्तु अर्ज किये बिना भी काम नहीं चलता" मुन्शी चुन्नीलाल कहनें लगा "ब्याहका काम छिड़ गया परन्तु अबतक रुपेका कुछ बन्दोबस्त नहीं हुआ आपनें दो सौके नोट दिये थे वह जाते ही चटनी हो गए। इस्समय एक हजार रुपयेका भी बन्दोबस्त हो जाय तो खैर कुछ दिन काम चल सक्ता है नहीं तो काम नहीं चल्ता"

"तुम जानते हो कि मेरे पास इस्समय नगद कुछ नहीं है और गहना भी बहुतसा काममें आचुका है” लाला मदनमोहन बोले “हां मुझको अपनें मित्रों की तरफ सै सहायता मिल्नें का पूरा भरोसा है और जो उन्की तरफ सै कुछ भी सहायता मिला तो मैं प्रथम तुह्मारी लड़की के ब्याहका बन्दोबस्त कर दूंंगा।

"और जो मित्रों सै सहायता न मिली तो मेरा क्या हाल होगा?” मुन्शी चुन्नीलालनें कहा “ब्याह का काम किसी तरह नहीं रुक सक्ता और बड़े आदमियों की नौकरी इसी वास्ते तन तोड़ कर की जाता है कि ब्याह शादी मैं सहायता मिले, बराबरवालोंमैं प्रतिष्ठा हो परन्तु मेरे मन्द भाग्य सै यहां इस्समय ऐसा मौका नहीं रहा इसलिये मैं आपको अधिक परिश्रम नहीं दिया चाहता। अब मेरी इतनी ही अर्ज है कि आप मुझको कुछ दिनकी रुख्सत देदैं जिससै मैं इधर उधर जाकर अपना कुछ सूझता करू”