पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/२८८

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परीक्षागुरू.
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पति सै अधिक स्त्रीके लिये कोई भी नहीं है" मदनमोहन की स्त्री लजा कर भीतर सैं कहनें लगी “पतिसै बिबाद करना तो बहुत बात है परन्तु शकुन्तलाके मन में दुष्यन्तकी अत्यंत प्रीति हुए पीछे शकुन्तला को दुष्यन्तके दोष कैसे दिखाई दिये यही बात मेरी समझ मैं नहीं आती फिर मैं शकुन्तला की अधिक नक़ल कैसे करू? मैं बड़ी आधीनता सैं कहती हूँँ कि ऐसे मर्मबेधी बचन कहकर मेरे हृदयको अधिक घायल मत करो और यह सब गहना ले जाकर होसके जितनी जल्दी इस डूबती नावको बचाने का उपाय करो. मुझको तुह्मारे साम्नें इस बिषयमें बात करते अत्यन्त लज्जा आती है हाय! यह पापी प्राण अब भी क्यों नहीं निकलते इस्सै अधिक और क्या दु:ख होगा?" यह बात सुन्तेही ब्रजकिशोर की आंखों सै आसू टपकनें लगे थोडी देर कुछ नहीं बोला गया उस्को उस्समय नारमेण्डी के अमीरजाद रोबर्टकी स्त्री समबिल्लाकी सच्ची प्रीति याद आई रोर्बट के शरीर मैं एक जहरी तीर लगनेंसैं ऐसा घाव होगया था कि डाक्टरोंके बिचारमैं जब तक कोई मनुष्य उस्का जहर न चूसे रोबर्ट के प्राण बचनें की आशा न थी और जहर चूसनें सै चूसनें वाले का प्रण भय था. रोबर्ट नें अपनी प्राण रक्षाके लिये एक मनुष्यके प्राण लेनें सर्वथा अंगीकार न किये परन्तु उस्की पतिव्रता स्त्रीनें उस्के सोतेमैं उस्के घाव का बिष चूसकर उस्पर अपनें प्राण न्योछावर कर दिये.

"बहन! मैं तुम्हारे लिये तुम सै कुछ नहीं कहता परंतु तुम्हारे छोटे छोटे बालकोंको देखकर मेरा हृदय अकुलाता है। तुम थोड़ी देर धैर्य धरो ईश्वर सब मंगल करेगा” लाला ब्रज किशोरनें जैसे तैसे हिम्मत बांधकर कहा.