पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/३५

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मित्रमिलाप
 


रखता है, पर मुझ को ये बातें नहीं आतीं मैं तो सच्चा आदमी हूँ. जो मन में होती है वह ज़बान से कहता हूं जो ज़बान से कहता हूं वह पूरी करता हूँ." लाला हरदयाल ने भरमा-भरमी अपना संदेह प्रकट करके अंत में अपनी सचाई जताई.


"तो क्या आपको इस समय यह संदेह हुआ कि मैंने बहकाने वालों पर रख कर अपनी तरफ से आपको " रुपये का दोस्त" और “मतलबका दोस्त" ठहराया है?” लाला मदनमोहन गिड़गिडा़ कर कहने लगे "हाय! आपने मुझको अबतक नहीं पहचाना. मैं अपने प्राण से अधिक आपको सदा समझता रहा हूं। इस संसार में आप से बढ कर मेरा कोई मित्र नहीं है जिस पर आपको मेरी तरफ़ से अबतक इतना संदेह बन रहा है मुझको आप इतना नादान समझते हैं. क्या मैं अपने मित्र और शत्रु को भी नहीं पहचानता? क्या आप से अधिक मुझको संसार में कोई मनुष्य प्यारा है? मैं अपना कलेजा चीर कर दिखाऊँ तो आपको मालूम हो कि आपकी प्रीति मेरे हृदय में कैसी अंकित हो रही है!”


"आप वृथा खेद करते हैं. मैं आपकी सच्ची प्रीति को अच्छी तरह जानता हूं और मुझको भी इस संसार में आप से बढ कर कोई प्यारा नहीं है. मैंने दुनिया का यह ढंग न केवल चालाक आदमियों की चालाकी जताने के लिये आप से कहा था आप वृथा अपने ऊपर ले दौड़े. मुझको तो आपकी प्रीति का यहां तक बिश्वास है कि सूर्य चन्द्रमा की चाल बदल जायगी तो भी आपकी प्रीति में कभी अंतर न आयेगा." लाला हरदयाल ने मदनमोहन के गले में हाथ डाल कर कहा.