पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/३६

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परीक्षा गुरु
२८
 

"प्रीति के बराबर संसार में कौन सा पदार्थ है?" लाला मदनमोहन कहने लगे "और सब तरह के सुख ममुष्य को द्रव्य से मिल सकते हैं पर प्रीति का सुख सच्चे मित्र बिना किसी तरह नहीं मिलता जिसने संसार में जन्म लेकर प्रीति का रस नहीं लिया उसका जन्म लेना बृथा है इसी तरह जो लोग प्रीति करके उस पर दृढ़ नहीं वह उसके रस से नावाकिफ़ है."


"नि:संदेह प्रीति का सुख ऐसा ही अलौकिक है. संसार में जिन लोगों को भोजन के लिये अन्न और पहने के लिये वस्त्र तक नहीं मिलता उनको भी अपने दुःख सुख के साथी प्राणोपम मित्र के आगे अपना दुःख रोकर छाती का बोझ हल्का करनेक पर, अपने दुःखों को सुन-सुन कर उसके जी भर आने पर, उसके धैर्य देने पर, उसके हाथ से अपनी डबडबाई हुई आखों के आंसू पुछ जाने पर, जो संतोष होता है वह किसी बड़े राजा को लाखों रुपए खर्च करने से भी नहीं हो सकता" लाला हरदयाल ने कहा.


"निस्सन्देह! मित्रता ऐसी ही चीज़ है पर जो लोग प्रीति का सुख नहीं जानते वह किसी तरह इसका भेद नहीं समझ सकते” लाला मदनमोहन कहने लगे.


"दुनिया के लोग बहुत करके रुपये के नफे नुक्सान पर प्रीति का आधार समझते हैं आज हरगोविंद ने लखनऊ की चार टोपियां मुझको अठारह रुपये में ला दी थीं इस पर हरकिशोर जल मरे और मेरी प्रीति बढ़ाने के लिये बारह रुपए में वैसी ही टोपियां मुझको देने लगे. इनके निकट प्रीति और मित्रता कोई ऐसी चीज़