पृष्ठ:परीक्षा गुरु.djvu/६९

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सभासद.
 


दौड़ाने में यह बड़ा धुरंधर था. इसकी प्रीति अपना प्रयोजन निकालने के लिये, और धर्म लोगों को ठगने के लिये था. यह औरों से विवाद करने में बड़ा चतुर था परन्तु इसको अपना चाल-चलन सुधारने की इच्छा न थी. यह मनुष्यों का स्वभाव भली-भांति पहचानता था, परन्तु दूर दृष्टि से हरेक बात का परिणाम समझ लेने की इसको सामर्थ्य न थी. जोड़ तोड़ की बातों में यह इयागो(शेक्सपियर कृत अथेलो नाम के नाटक का खलनायक) का अवतार था. कणिक की नीति पर इसका पूरा विश्वास था. किसी बड़े काम का प्रबंध करने की इसको शक्ति न थी परन्तु बातों में धरती और आकाश को एक कर देता था. इसके काम निकालने के ढंग दुनिया से निराले थे. यह अपने मतलब की बात बहुधा ऐसे समय करता था जब दूसरा किसी और काम में लग रहा हो जिससे इसकी बात का अच्छी तरह विचार न कर सके अथवा यह काम की बात करती बार कुछ-कुछ साधारण बातों की ऐसी चर्चा छेड़ देता था जिससे दूसरे का मन बटा रहे अथवा कोई बात रुचि के विपरीत अंगिकार करानी होती थी तो यह अपनी बातों में हर तरह का बोझ इस ढब से डाल देता था कि दूसरा इन्कार न कर सके कभी-कभी यह अपनी बातों को इस युक्ति से पुष्ट कर जाता कि सुनने वाले तत्काल इसका कहना मान लेते, जो काम यह अपने स्वार्थ के लिये करता उसका प्रयोजन सब लोगों के आगे और ही बताता था और अपनी स्वार्थपरता छिपाने के लिये बड़ी आना कानी से वह बात मंजूर करता था. यह अपने बैरी की ब्याज स्तुति इस ढब में करता था कि लोग इसका कहना इसकी दयालुता और शुभचिन्तकता से समझने लगते थे.