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परीक्षा गुरु
८६
 


पछतावा होता है, जो लोग कुछ काल श्रद्धा और यत्नपूर्वक धर्म का आनंद लेकर इस दलदल में फसते हैं उनसे आत्मग्लानि और आंतरिक दाह का क्लेश पूछना चाहिये."

"टर्की का खलीफा मन्तासर अपने बाप को मरवाकर उसके महल का कीमती सामान देख रहा था उस समय एक उम्दा तस्वीर पर उसकी दृष्टि पड़ी जिसमें एक शुशोभित तरुण पुरुष घोड़े पर सवार था और रत्नजड़ित ‘ताज’ उसके सिर पर शोभायमान था. उसके आस-पास फारसी में बहुत-सी इबारत लिखी थी। ख़लीफ़ा ने एक मुन्शी को बुला कर वह इबारत पढ़वाई उसमें लिखा था कि "मैं सीरोज़ खुसरो का बेटा हूं. मैंने अपने बाप का ताज लेने के वास्ते उसे मरवा डाला पर उसके पीछे वह ताज मैं सिर्फ छह महीने अपने सिर पर रख सका.” यह बात सुनते ही ख़लीफ़ा मौन्तासर के दिल पर चोट लगी और अपने आंतरिक दु:ख वह केवल तीन दिन राज कर के मर गया.”

"यह आत्मग्लानि अथवा आंतरिक क्लेश किसी नए पंछी को जाल में फसने से भले ही होता हो, पराने खिलाड़ियों को तो इसकी ख़बर भी नहीं होती. संसार में इस समय ऐसे बहुत लोग मौजूद हैं जो दूसरे के प्राण लेकर हाथ भी नहीं धोते.” मास्टर शिंभूदयाल ने कहा.

"यह बात आपने दुरुस्त कही. निस्संदेह जो लोग लगातार दुष्कर्म करते चले जाते हैं और एक अपराधी बदला लेने के लिये आप अपराधी बन जाते हैं अथवा एक दोष छिपाने के लिये दूसरा दूषित कर्म करने लगते हैं या जिनको केवल अपने मतलब से गर्ज रहती है उनके मन से धीरे-धीरे अधर्म की अरुचि उठती जाती