पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१००

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सारे जहान का पचड़ा केवल स्त्री ही के कारण ढोना पड़ता है। फारसी में जन (स्त्री) कहते हैं मारने वाले को 'राहजन', 'नक-बज़न' इत्यादि भला अष्टप्रहार मारनेवाले का संसर्ग रख के कौन सुखी रहा है । एक फारस के कवि फरमाते हैं 'अगर नेक बूदे सरं-जामे जन्, भजन नाम न जन् नामें जन्' अर्थात् स्त्रियों (स्त्रीसम्बन्ध) का फल अच्छा होता तो इनका नाम मजन होता (मा.मारय)। अंगरेजी में वी म्येन (स्त्री) शब्द मेंय दि एक ई(E अक्षर)और बढ़ा दें तो Woe (वो)शब्द का अर्थ है शोक और म्येन कहते हैं मनुष्य को । जिसका भावार्थ हुआ कि मनुष्य के हक में शोक का रूप। दुष्टा कटुभाषिणी कुरूपा स्त्रियों की कथा जाने दीजिये। उनके साथ तो प्रतिक्षण नर्क जातना हुई है यदि परम साध्वी महा मृदु भाषिणी अत्यन्त सुन्दरी हों तो भी बंधन ही है। हम चाहते हैं कि अपना तन, मन, धन, सर्वस्व परमेश्वर के भजन में, राजा के सहाय में, संसार के उपकार में निछावर कर दें। पर क्या हम कर सकते हैं ? कभी नहीं । क्यों ? गृह स्वामिनी किस को देख के जिएँगी वे खाएँगी क्या ? हमारा जी चाहता है कि एक बार अपनी राज राजेश्वरी का दर्शन करें, देश देशान्तर की सैर करें। घर में रुपया न सही। सब बेंच खोंच के राह भर का खर्च निकाल लेंगे। पर मन की तरंग मन ही में रह जाती हैं, क्योंकि घर के लोग दुःख पावेंगे, हम पढ़े लिखे लोग हैं। प्रतिष्ठित कुल के भये उपजे हैं; एक तुच्छ व्यक्ति की नौकरी करके बातें कुबातें न सुनेंगे । स्थानांतर में चले जायंगे, दो चार रुपये की मजदूरी