पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१०१

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कर खायँगे । गुलामी तो न करनी पड़ेगी। पर खटला लिये लिये कहाँ फिरेंगे; घर वाली को किसके माथे छोड़ जायेंगे। यही सोच साच के जो पड़ती है सहते हैं। इन सब तुच्छताओं का कारण स्त्री है। जिसके कारण हम गिरस्त कहाते हैं अर्थात् गिरते गिरते अस्त हो जाने वाला। भला हम अपने आत्मा की, अपने समाज की उन्नति क्या करेंगे।

एक रामायण में लिखा है कि जिस समय रावण मृत्यु के मुख में पड़े थे, 'अब मरते हैं', 'तब मरते हैं' की लग रही थी उस समय भगवान रामचन्द्र जी ने कहा-लक्ष्मण जी से कि रावण ने बहुत दिन तक राज्य किया है, बहुत विद्या पढ़ी है उनके पास जाओ। यदि वे नीति की दो बातें भी बतला देंगे तो हमारा बड़ा हित होगा। हमें अभी अयोध्या चल के राज्य करना है। लक्ष्मण जी भ्रातृ चरण की आज्ञानुसार गये और अभीष्ट प्रकाश किया। रावण ने उत्तर दिया कि अब हम पर लोक के लिये वद्धपरिकर हैं । अधिक शिक्षा तो नहीं दे सकते पर इतना स्मरण रखना-कि तुम्हारे पिता दशरथ महाराज बड़े विद्वान और बहुद्रष्टा थे। पर उन्होंने कैकेई देवी का बचन मानने कारण पुत्र- वियोग और प्राण-हानि सही । और हम भी बड़े भारी राजा थे, पर मन्दोदरी रानी की बात कभी न मानते थे। उसका प्रत्यक्ष फल तुम देख ही रहे हो । सारांश यह है कि स्त्री को मुँह लगाना भी हानिजनक है और तुच्छ समझना भी मंगलकारक नहीं है।