पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१०६

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करने के लिये अपने तई अक्षम समझना उचित है। प्रेम सिद्धान्त यह भी सिखाता है कि सीता-राम, राधा-कृष्ण, गौरी-शंकर, माता-पिता आदि पूज्य मूर्तियों को दो समझना, अर्थात यह बिचारना कि यह और हैं वह और हैं इनका महत्व उनसे कुछ न्यूनाधिक है, महापाप है । फारसी में 'दोस्त' का शब्द भी यही द्योतन करता है कि दो को एक हो रहना ही सार्थकता है। नहीं तो दो बहुवचन है उसके साथ (स्त = अस्त ) क्रिया न होनी चाहिए थी। व्याकरण के अनुसार (स्तन्द =अस्तन्द वा हस्तन्द ) होना चाहिए पर वहीं बहुवचन को क्रिया होने से द्वैतभाव प्रकाश होता। इससे यही उचित ठहरा कि शरीर दो हों तो भी मन. बचन कर्म एक होना चाहिए; इसी से कल्याण है। नहीं तो जहां दो हैं वहीं अनर्थ है।

संसार को हमारे पूर्वजों ने दुःखमय माना है-'संसारे रे मनुष्या बदत यदि सुखं स्वल्प मप्यस्ति किंचित ।' इसका कारण यही लिखा है कि इसका अस्तित्व द्वन्द पर निर्भर है अर्थात् मरना और जन्म लेना जब तक रहता है तब तक शांति नहीं होने पाती इससे यत्नपूर्वक इन दोनों (जन्म मरण) से छुट जाय तभी सदा सुखी और मुक्त होता है। हमारे प्रेम शास्त्र में भी यही उपदेश हैं कि इस द्वन्द (मरण जीवन ) में से एक का दृढ़ निश्चय करले वही निर्द्वन्द अर्थात् जीवन मुक्त होता है । या तो प्रेम समुद्र के डूब के मर जाय, अर्थात दुःख-सुख, लाभ-हानि,निन्दा-स्तुति, स्वर्ग-नर्कादि की इच्छा चिन्ता भय इत्यादि से मृतक

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