पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/११८

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'पागल न हो जाता हो? जब जड़ वृक्ष,आम भी बौराते हैं तब आम-खास सभी को बौराने की की क्या बात है ? पर सबसे अधिक भडुओं का महत्व बढ़ जाता है। बड़े बड़े दरबारों में उनकी पूछ पैठार होती है। बड़े बड़े लोगों को उनकी पदवी मिलती है।


किस पर्व में किस पर

आफ़त आती है

नौरात्र, चैत्र और कुवांर दोनों में बकरों पर । हमारे कनौ- जिया भाई एवं बंगाली भाई उन बिचारे अनबोल जीवों का गला काटने ही में धर्म समझते हैं।

बैसाख, जेठ, असाढ़ बरी हैं, तो भी छोटी मछलियों को आसन-पीड़ा है। जिसे देखो वही गंगा जी को मथ रहा है। सावन में, विशेषतः रक्षा-बंधन के दिन कंजूस महाजनों का मरन होता है, इनका कौड़ी कौड़ी पर जी निकलता है, पर ब्राह्मण-देवता मुसकें बांधने की रस्सी की भांति राखी लिए छाती पर चढ़े, घर में घुसे आते हैं।

भादों में स्त्रियों की मरही होती है। हरतालिका पानी पीने में भी पाप चढ़ाती है ! बहुत सी बुढ़ियां तमाखू की थैली गाले पर धर के पड़ रहती हैं। सभी तो पतित्रता हईं नहीं,