पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१८३

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( १७२ )

ऐसी कठिन पीर में कैसहु धीरज हाय न आवै॥
देशभक्त दुखिया बुध जन के जिय ते कोऊ पूछे।
तुम तौ अपने मन के राजा सब दुख सुख ते छूछे॥
तुम जो कछू करो सो नीको यह तो हमहूँ जाने।
पै तुम्हरे प्रताप की प्यारे ! बुधि नहिं आज ठिकाने॥
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भारतेन्दु हरिश्चंद्र के स्वास्थ्य लाभ
के उपलक्ष्य में।

(कसीदा)
अहा हा क्या मज़ा है क्या बहार बारिश आई है यह।
फस्ले फ़रहत अफ़ज़ा कैसी सबके जी को भाई है॥
जिधर देखो तमाशाए तरावत बख्श है तुर्फ़ा।
जिसे देखो अजब एक ताज़गी चिहरे पै छाई है॥
इधर जंगल में मोरों को चढ़ी है नाचने की धुन।
उधर गुलशन में कोयल को सरे नरमा सराई है।
कहे गर इन दिनों वायज कि मै पीना नहीं अच्छा।
तो बेशक मस्त कह बैठे कि तुमने भांग खाई है॥
किसी की कोई कुछ पर्वा नहीं करता ज़माने में।
सब अपने रंग माते हैं कुछ ऐसी बू समाई है॥