पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१८८

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भयो अचानक दुसह दुःख दै हरि पुर राही॥
तेरे बिन हा हन्त कतहुं कछु नहिं सुहायरे।
हाय हायरे हाय हायरे हाय हायरे॥
कहां जायं का करैं कौन बिधि जिय समुझावैं।
हम कोउ ऋषि मुनि नाहिं क्यों न फिर ज्ञान गंवावै॥
जो जनम्यो सो अवसि मरैगो हमहूं जानैं।
पै ऐसो दुख देखि चित्त नहिं रहत ठिकानैं॥
कबहुं काहु बिन कछु जग कारज रहत न अटके।
पै ऐसे थल नहिं मानत मन बिन सिर पटके॥
याते रहि रहि कहि कहि आवत उर ते एही।
हाय ब्रैडला हाय सत्य के सहज सनेही॥
अमित पंचमी माघ की हरि शशि संवत् सात।
स्वर्ग सिधारे ब्रैडला तजि मित्रन बिलखात॥
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होली है अथवा होरी है।
बीती सीतकाल की सांसति ब्यार बसन्ती डोली है।
फूले फूल बिपिन बागन के जीह कोकिलन खोली है॥
बदली गति मति जड़ चेतन की सुखमा सुखद अतोली है।
भयो नयो सो जगत देखियत अहो आय गइ होली है॥१॥
यों तो माँह सुदी पाँचे ते उर उमङ्ग नहिं थोरी है।
राग रङ्ग रस चहल पहल की चरचा चारहुं ओरी है॥