पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१८९

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पै अब तो फागुन महिना है मस्ती को जुनि चोरी है।
यामें कौ अभागि ऐसो जाहि चढ़त नहि होरी है॥२॥
जब ह्वै चुक्यो होलिका पूजन चढ़ि भइ अच्छत रोली है।
तब काहे की लाज कौन डर सव विधि उचित मखोली है॥
आओ चलि देखिये कहां कह कैसी कैसी टोली है।
केहि केहि के सिर कौन कौन से बाहन आई होली है॥३॥
आहा ! अजब रङ्ग है सब पै देह न तनिको कोरी है।
कारे पीले लाल रंग सों लथ पथ पाग पिछौरी है॥
कर मुख पै लपिट्यो लखात काजर गुलाल अरु रोरी है।
नख ते सिख लौं छाय रही बहु रंग रंगीली होरी है॥४॥
कतहुं कीच उछरै कहुं पानी कहुं कहुं माटी घोली है।
जूती उछरै धूरि उडै कहुं गाली गीत ठठोली है॥
कतहूं बिंदुली देत समय आये २--की बोली है।
बिना खरच हूं हंसी खुशी में दिवस बितावत होली है॥५॥
कोऊ डफ कोउ ढोल बजावत कोउ झांझ की जोरी है।
कोऊ गावत कोउ बकत निलज है बातैं फोरी फोरी है॥
कोऊ बेढंग नाच रह्यो कोउ पीटत वृथा थपोरी है।
बैठे ठाढ़े चलत मिलत जग भाखत होरी होरी है॥६॥
कहुं पिचकारी चलै रङ्ग की कहुं अबीर की झोली है।
कहुं कबीर कहुं फाग होत कहुं हांसी बोली ठोली है।
कहुं दूधिया भांग छनै कहुं जाती बोतल खोली है।
जित देखो तित भांति भांति से मोद मचावत होली है॥७॥