पृष्ठ:प्रताप पीयूष.djvu/१९२

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राह चलत हन्टर हनिबो कोउ समझत सहज ठठोली है।
कोऊ बूट प्रहार करत कोऊ निधरक मारत गोली है॥
जबरदस्त की बीसों बिसुवा कोऊ सकत न बोली है।
हा बिजयिनि ! तब प्रजा भाग में चहुं दिशि लागी होली है॥१९॥
हा अभाग तव हाथ अधौगति छाय रही चहुं ओरी है।
ताहू पर घर घर जन जन में मत विवाद मुड़ फोरी है॥
जाने काह कियों चाहत विधि अविधिन दीसति थोरी है।
मेरे चित याही चिन्ता सों जरत रहति नित होरी है॥२०॥
अहो प्रेमनिधि प्राणनाथ व्याकुलता मोहि अतोली है।
जग है सुखित दुखित मैं, यहि छिन कौन पवन धौं डोली है।
मेरे प्यारे जीवनधन, बस अब नहिं उचित बतोली है।
धाय आय दुख हरो बेगि नहिं मेरी गति सब होली है॥२१॥
अरे निठुर छलिया निर्मोही, कौन बानि यह तोरी है।
पीर न जानत काहू की बस एक सिखी चित चोरी है॥
ऐसेहु अवसर दया करत नहिं अजहुं वैसिही त्योरी है ।
हा हा कहा अजहुँ तरसै हम ? अरे आज तौ होरी है॥२२॥
अब नहिं सही जात निठुराई अन्त भई बस होली है।
अपने सों ऐसी नहिं चहिये बहुत करी करि जोली है॥
बरस दिना को दिन है प्रियतम, यह शुभ घरी अमोली है।
चूकि क्षमौ निज दिशि देखो आयो मिलि जाओ होली है॥२३॥
आज लाज को काज कहा है फाग मचों चहुं ओरी है।
भेंटौ मोंहि निसंक अंक भरि कछु काहू की चोरी है॥