पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/१२०

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तब तो ये वहाँ से निरास हो अछताय पजताय श्रीकृष्ण के पास आय बोले―महाराज, भीख माँग मान महत गँवाया, तौ भी खाने को कुछ हाथ न आया। अब क्या करें। श्रीकृष्णजी ने कहा कि अब तुम तिनकी स्त्रियो से जा माँगो, वे बड़ी दयावंत धर्मात्मा हैं, उनकी भक्ति देखिंयो, वे तुन्हें देखते ही आदर मान से भोजन देगी। यो सुन ये फिर वहाँ गये जहाँ वे बैठी रसोई करती थीं। जाते ही उनसे कहा कि बन में श्रीकृष्ण को धेनु चराते क्षुधा भई है सो हमें तुम्हारे पास पठाया है, कुछ खाने को होय तो दो। इतना बचन ग्वालो के मुख से सुनते ही वे सब प्रसन्न हो कंचन के थालों में षटरस भोजन भर ले ले उठ धाई और किसी की रोकी न रुकीं।

एक मथुरनी के पति ने जो न जाने दिया तो वह ध्यान कर देह छोड़ सबसे पहले ऐसे जा मिली जैसे जल जल में जा मिले औ पीछे से सब चलीं चलीं वहाँ आई, जहाँ श्रीकृष्णचंद ग्वाल बाल समेत वृक्ष की छाँह में सखा के काँधे पर हाथ दिये, त्रिभंगी छबि किये, कँवल का फूल कर लिये खड़े थे। आते ही थाल आगे धर दंडवत कर हरि मुख देख देख आपस में कहने लगीं कि सखी, येई हैं नंदकिशोर जिनका नाम सुन ध्यान धरती थीं, अब चंदमुख देख लोचन सुफल कीजे औ जीतब का फल लीजे। ऐसे बलराय हाथ जोड़ बिनती कर श्रीकृष्ण से कहने लगीं कि कृपानाथ,आपकी कृपा बिनु तुम्हारा दर्शन कब किसी को होता है, आज धन्य भाग हमारे जो दर्शन पाया औ जन्म जन्म का पाप गँवाया।

मूरख बिप्र कृपन अभिमानी। श्रीमद लोभ मोह मद सानी॥