पृष्ठ:प्रेमसागर.pdf/१२१

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
( ७३ )


ईश्वर को मानुष करि माने । माया अंध : कहा पहिचाने।। जप तप यज्ञ जासु हित कीजे । ताकौ कहाँ न भोजन दीजे ।।

महाराज, वही धन्य है धन जन लाज, जो आवे तुम्हारे काज, औ सोई है तप जप ज्ञान, जिसमे आवे तुम्हारा नाम । इतनी बात सुन श्रीकृष्णचंद उनकी क्षेम कुशल पूछ कहने लगे कि, मत तुम मुझको करो प्रनान । मै हूँ नन्द महर का श्याम ॥

जो ब्राह्मन की स्त्री से आपको पुजवाते हैं सो क्या संसार में कुछ बड़ाई पाते है । तुमने हमे भूखे जान दया करे बन में आन सुध ली, अब हम यहाँ तुम्हारी क्या पहुनई करे ।

वृंदावन घर दूर हमारा । किस विधि आदर करे तुम्हारा ।।

जो वहाँ होते तो कुछ फूल फल ला आगे धरते, तुन हमारे कारन दुख पाय जंगल में आई औ यहाँ हमसे तुम्हारी दहल कुछ न बन आई, इस बात का पछतावा ही रहा। ऐसे सिष्टाचार कर फिर बोले-तुम्हे आए बड़ी देर भई, अब घर को सिधारिये, क्योकि ब्राह्मण तुम्हारे तुम्हारी बाट देखते होगे, इसलिये कि स्त्री बिन यज्ञ सुफल नही । यह बचन श्रीकृष्ण से सुन वे हाथ जोड़ बोलीं-महाराज, हमने आपके चरन कमल से स्नेह कर कुटुंब की माया सब छोड़ी क्योंकि जिनका कहा न मान हमें उठ धाई तिनके यहाँ अब कैसे जायें, तो वे घर में न आने दें तो फिर कहाँ बसे, इससे आपकी सरण में रहें सो भेला, और नाथ, एक नारि हमारे साथ तुम्हारे दरसन की अभिलाषा किये अवती थी, जिसके पति ने रोक रखा, तब उस स्त्री ने अकुला कर अपना जीव दिया | इस बातके सुनते ही हँसकर श्रीकृष्णचंद ने जिसे दिखाया