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प्रेमाश्रम

लिया है, मेडे खोद डाली है। जब तक फिर से पैमाइश न हो कुछ पता नहीं चल सकता कि अपकी कितनी जमीन उन्होंने खायी है।

गायत्री---क्या वहाँ का कारिन्दा सो रहा है? मेरा तो इन झगड़ो से नाकोदम है।

कानूनगो- हुजूर की जानिब से पैमाइश की एक दरख्वास्त पेश हो जाय, बस बाकी कीम मैं कर लूंगा। हाँ, सदर कानूनगो साहब की कुछ खातिर करनी पड़ेगी। मैं हुजूर को गुलाम हूँ, ऐसी सलाह हगिज न दूंगा जिससे हुजूर को नुकसान हो। इतनी अर्ज और करूंगा कि हुजूर एक मैनेजर रख लें। गुस्ताखी माफ, इतने बड़े इलाके का इन्तजाम करना हुजूर का काम नहीं हैं।

गायत्री मैनेजर रखने की तो मुझे भी फिक्र है, लेकिन लाऊँ कहाँ से? कहीं वह महाशय भी कारिन्दो से मिल गये तो रही-सही बात भी बिगड़ जायेगी। उनका यह अन्तिम आदेशा था कि मेरी प्रजा को कोई कष्ट न होने पाये। उसी आशा को पालने करने के लिए मैं यों अपनी जान खपी रही हैं। आपकी दृष्टि में कोई ऐसा ईमानदार और चतुर आदमी हो, जो मेरे सिर से यह भार उतार ले तो बतलाइए।

कानूनगो—बहुत अच्छा, मैं ख्याल रखूँगा। मेरे एक दोस्त है। ग्रेजुएट, बड़े लायक और तजरबेकार। खानदानी आदमी हैं। मैं उनसे जिक्र करूंगा। तो मुझे क्या हुक्म होता है? सदर कानूनगो साहब से बात-चीत करूँ?

गायत्री—जी हाँ, कह तो रही हूँ। वही लाला साहब हैं न? लेकिन वह तो बेतरह मुंह फैलाते हैं।

कानूनगो--हुजूर खातिर जमा रखे, मैं उन्हे सीधा कर लूंगा। औरों के साथ वह चाहे कितना मुँह फैलाये, यहाँ उनकी दाल न गलने पायेगी। बस हुजूर के पाँच सौ रुपये खर्च होंगे। इतने में ही दोनों गाँवों की पैमाइश करा दूंगा।

गायत्री-(मुस्कुरा कर) इसमे कम से कम आघा तो आपके हाथ जरूर लगेगा।

कानूनगो मुआजल्लाह, जनाब यह क्या फरमाती हैं? मैं मरते दम तक हुजूर को मुगालता न दूंगा। हाँ, काम पूरा हो जाने पर हुजूर जो कुछ अपनी खुशी से अदा करेगी वह सिर आंखो पर रखूँगा।

गायत्री तो यह कहिए, पाँच सौ के ऊपर कुछ और भी आपको भेंट करना पड़ेगा। मैं इतना मंहगा सौदा नहीं करती।

यही बातें हो रही थी कि पंडित लेखराज जी का शुभागमन हुआ। रेशमी अचकन, रेशमी पगड़ी, रेशमी चादर, रेशमी धोती, पाँव मे दिल्ली का सलेमशाही कामदार जूता, माथे पर चन्द्रबिन्दु, अधरों पर पान की लाली, आँखो पर सुनहरी ऐनक; केवड़ो में बसे हुए आ कर कुर्सी पर बैठ गये।

गायत्री-पंडित जी महाराज को पालागन करती हैं।

लेखराज--आशीर्वाद! आज तो सरकार को बहुत कष्ट हुआ।

गायत्री-क्या करूं मेरे पुरखो ने भी बिना खेती की खेती, बिना जमीन की जमींदारी, बिना घन के महाजनी प्रथा निकाली होती, तो मैं भी आपकी ही तरह