पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/५४

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प्रेम-पंचमी

दो। कहने लगे, मेरे पास है क्या। मैंने कहा ( लज़ाकर ), तो ब्याह क्यों किया? बस बातों-ही-बातों में तकरार मान गए।

इतने में शीतला को सास आ गई। सुरेश ने शीतला की माँ और भाइयों को उनके घर पहुँँचा दिया था, इसलिये यहाँ अब शांति थी। सास ने बहू की बात सुन ली थी। कर्कश स्वर से बोली―बेटा, तुमसे क्या परदा है। यह महारानी देखने ही को गुलाब का फूल हैं, अंदर सब काँटे हैं। यह अपने बनाव- सिगार के आगे विमल की बात ही न पूछती थी। बेचारा इस पर जान देता था; पर इसका मुँह ही न सीधा होता था। प्रेम तो इसे छू नहीं गया। अंत को उसे देश से निकालकर इसने दम लिया!

शीतला ने रुष्ट होकर कहा―क्या वही अनोखे धन कमाने घर से निकले हैं? देश-विदेश जाना मरदो का काम ही है।

सुरेश―योरप में तो धन-भोग के सिवा स्त्री-पुरुष में कोई संबंध ही नहीं होता। बहन ने योरप में जन्म लिया होता, तो हीरे-जवाहिर से जगमगाती होती। शीतला, अब तुम ईश्वर से यही कहना कि सुदरता देते हो, तो योरप में जन्म दो।

शीतला ने व्यथित होकर कहा―‘जिनके भाग्य में लिखा है, वे यही सोने से लदी हुई हैं। मेरी भाँति सभी के करम थोड़े ही फूट गए है।”

सुरेशसिंह को ऐसा जान पड़ा कि शीतला की मुख-कांति मलिन हो गई है। पति-वियोग में भी गहनो के लिये इतनी