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प्रेम-पंचमी

बादशाह ने मुसाहबों से कहा―“मैं भी वही चलता हूँ। ज़रा देखूँँगा कि नमकहरामो की लाश क्योकर तड़पती है।”

कितनी घोर पशुता थी! यही प्राणी ज़रा देर पहले बादशाह का विश्वास-पात्र था!

एकाएक बादशाह ने कहा―“पहले इस नमकहराम की खिलअ़त उतार लो। मैं नहीं चाहता कि मेरी खिलअ़त की बेइज्ज़ती हो।”

किसकी मजाल थी, जो ज़रा भी ज़बान हिला सकता। सिपाहियों ने राजा साहब के वस्त्र उतारने शुरू किए। दुर्भाग्य- वश उनकी एक जेब से पिस्तौल निकल आई। उसकी दोनो नालियाँ भरी हुई थीं। पिस्तौल देखते ही बादशाह की आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगीं। बोले―“क़सम है हज़रत इमामहुसेन की, अब इसकी जाँबख्शी नहीं करूँगा। मेरे साथ भरी हुई पिस्तौल की क्या ज़रूरत! ज़रूर इसकी नीयत में फितूर रहता था। अब मैं इसे कुत्तों से नुचवाऊँगा। ( मुसाहबों की तरफ़ देखकर ) देखी तुम लोगों ने इसकी नीयत! मैं अपनी आस्तीन में साँप पाले हुए था। आप लोगों के खयाल में इसके पास भरी हुई पिस्तौल का निकलना क्या माने रखता है?”

अँगरेज़ों को केवल राजा साहब को नीचा दिखाना मँजूर था। वे उन्हें अपना मित्र बनाकर जितना काम निकाल सकते थे, उतना उनके मारे जाने से नहीं। इसी से एक अँगरेज़ मुसा- हब ने कहा―“मुझे तो इसमे कोई ग़ैरमुनासिब बात नहीं मालूम