पृष्ठ:प्रेम-पंचमी.djvu/८१

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राज्य भक्त

कप्तान―आप मेरे मुहसिन हैं। आपके हुक्म से मुँह नहीं मोड़ सकता। लेकिन―

राजा―जल्दी करो, जल्दी करो। अपनी तलवार मुझे दे दो। अब इन तकल्लुफ की बातों का मौका नहीं है।

कप्तान साहब निरुत्तर हो गए। सजीव उत्साह में बड़ी संक्रामक शक्ति होती है। यद्यपि राजा साहब के नीति-पूर्ण वार्तालाप ने उन्हे माक़ूल नहीं किया, तथापि वह अनिवार्य रूप से उनकी बेडियाँ खोलने पर तत्पर हो गए। उसी वक्त़ जेल के दारोगा को बुलाकर कहा―साहब ने हुक्म दिया है कि राजा साहब को फौरन् आज़ाद कर दिया जाय। इसमें एक पल की भी ताख़ीर ( विलंब ) हुई, तो तुम्हारे हक़ में अच्छा न होगा।

दारोग़ा को मालूम था, कप्तान साहब और मि॰... में गाढ़ी मैत्री है। अगर.... साहब नाराज़ हो जायँगे, तो रोशनुद्दौला की कोई सिफारिश मेरी रक्षा न कर सकेगी। उसने राजा साहब की बेड़ियाँ खोल दी।

राजा साहब जब तलवार हाथ में लेकर जेल से निकले, तो उनका हृदय राज्य-भक्ति की तरंगों से आंदोलित हो रहा था उसी वक्त़ घड़ियाल ने ११ बजाए।

( ३ )

आधी रात का समय था। मगर लखनऊ की तंग गलियो में ख़ूब चहल-पहल थी। ऐसा मालूम होता था, अभी सिर्फ