पृष्ठ:बंकिम निबंधावली.djvu/१७०

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जुगनू ।
 

अपने प्रकाशसे प्रकाशित करनेकी चेष्टा करते हैं ? है, अन्धकारमें मग्न होनेमें सुख—आमोद है । कोई देखेगा नहीं, अन्धकारमें तुम ज्वलित होओगे, और इस अँधेरेके अन्धकारमें मैं जलूँगा; अनेक ज्वालाओंसे जलूँगा। जीवनका तात्पर्य समझनेमें अत्यन्त कठिन, अत्यन्त गूढ और अत्यन्त भयंकर है । सोचो तो, क्षुद्र होकर तुम क्यों प्रज्वलित होते हो, और क्षुद्र होकर मैं ही क्यों जलता हूँ? तुम क्या इस बातको सोचते हो? तुम अगर नहीं सोचते तो तुम सुखी हो । मैं तो सोचता हूँ, मैं असुखी हूँ। तुम कीट हो, और मैं भी कीट—अत्यन्त क्षुद्र कीट—हूँ। तुम सुखी हो, मैं किस पापसे असुखी हूँ? तुम क्या सोचते हो कि तुम जगतके प्रकाशक सूर्य क्यों नहीं हुए ? आकाश और समुद्रकी शोभा चन्द्रमा क्यों नहीं हुए ? क्यों न वही हुए ? तुम क्या कभी सोचते हो कि ग्रह, उपग्रह, धूमकेतु, छायापथ आदि कुछ न होकर तुम जुगनू ही क्यों हुए ? जिस ईश्वरने इन सब चीजोंकी सृष्टि की है, उसीने तुम्हारी भी सृष्टि की है । जिसने इन सबको प्रकाश दिया है उसीने तुमको भी प्रकाश दिया है । उसने एकको बड़ा और दूसरेको छोटा क्यों बनाया ? अन्धकारमें इतना घूमकर सोचनेसे तुमने कुछ जाना है ? ।

तुम सोचो या न सोचो, मैं सोचता हूँ। मैंने सोचकर निश्चय किया है कि विधाताने तुमको और मुझको केवल अँधेरी रातके लिए ही भेजा है। तुम्हारा और सूर्यका प्रकाश एक ही है—दोनों ही जगदीश्वरके दिये हुए हैं; तथापि तुम केवल वर्षाकी रातके लिए हो और मैं भी केवल इस वर्षाकी रातके लिए हूँ। आओ रोवें।

आओ रोवें । वर्षाके साथ तुम्हारा और मेरा नित्य सम्बन्ध क्यों है ? प्रकाशपूर्ण नक्षत्रोंकी आभासे उज्ज्वल वसन्तऋतुके आकाशमें तुम्हारे और मेरे लिए स्थान क्यों नहीं है ? वसन्त चन्द्रमाके लिए है, सुखीके लिए है, निश्चिन्तके लिए है, और वर्षा तुम्हारे लिए है, दुखीके लिए है, मेरे लिए है । इसी लिए मैंने रोनेकी इच्छा प्रकट की थी—किन्तु न रोऊँगा। जिसने तुम्हारे और मेरे लिए इस संसारको अन्धकारमय बनाया है,

रोकर उसको दोष न दूंगा । यदि उसकी यही इच्छा है कि अन्धकारके साथ तुम्हारा मेरा नित्य सम्बन्ध रहे, तो आओ अन्धकारको ही प्यार करें।

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