एतद्देशीय एतद्देशीय - वि० इस देश का । एतबार - संज्ञा पुं० विश्वास । एतराज़ - संज्ञा पुं० विरोध | पतवार - संज्ञा पुं० दे० "इतवार " । एता + - वि० [स्त्री० एती ] इतना | एतादृश - वि० ऐसा । पतिकी - वि० स्त्री० इतनी । एरंड -संज्ञा पुं० रेंड़ | रेंड़ी | एलची - संज्ञा पुं० राजदूत | एला-संज्ञा स्त्री इलायची । एवं क्रि० वि० ऐसा ही । १२३ १. एक निश्चयार्थक एव-अव्य० शब्द । ही । २. भी । एषज्ञ - संज्ञा पुं० ब्रदला । एवजी -संशा स्त्री० स्थानापन्न पुरुष / एह सर्व० यह । वि० यह । एहसान - संज्ञा पुं० उपकार | एहसानमंद - वि० कृतज्ञ । एहि सर्व ० इसको । पहा- ° - अव्य० हे । ऐ । ऐ-संस्कृत वर्णमाला का बारहवीं चार हिंदी या देवनागरी वर्णमाला का नव स्वर वर्ण जिसका उच्चारण- स्थान कंठ और तालु है । ऐ - अव्य० १. एक अव्यय जिसका प्रयोग अच्छी तरह न सुनी या समझी हुई बात को फिर से कह- लाने के लिये होता है । २. एक आश्चर्यसूचक श्रव्यय । चना- क्रि० स० खींचना । ऐचा ताना- वि० जिसकी पुतली ताकने में दूसरी ओर को खिँचती हो । भेंगा । ऐ चातानी-संज्ञा स्त्री० खींचा-खींची। ऐना - क्रि० स० झाड़ना । ऐ ऐ उना - क्रि० स० १. मरोड़ना । २. फँसना । क्रि० प्र० १. अकड़ना । २. घमंड करना । ३. टर्राना । ऐंठवाना- क्रि० स० ऐठने का काम दूसरे से करवाना | पेड़ - संज्ञा पुं० १. ऐंठ । गर्व । २. पानी का भँवर । वि० निकम्मा । ऐ ख़दार - वि० घमंडी । ऐड़ना- क्रि० प्र० ऐ उना | क्रि० स० ऐठना । ऐ डुबे डु० - वि० टेढ़ा | ऐंडा - वि० [स्त्री० ऐड़ी ] टेढ़ा । ऐठ - संज्ञा स्त्री० १. अकड़ । २. गर्व । ऐड़ाना - क्रि० प्र० अँगड़ाई लेना । ऐंठन -संज्ञा स्त्री० लपेट । ऐठा हुआ । बदन तोड़ना ।
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