पृष्ठ:बिरजा.djvu/१४

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 इस्की अपेक्षा अधिक लिखना पढ़ना नहीं हो सका। यकिञ्चित् लिखना पढ़ना सीख कर लो दोष हो जाता है वह गंगाधर में हो गया था किन्तु गोविन्दचन्द्र बड़े धीरस्वभाव थे। यद्यपि उन्होंने कभी विद्यालय के काष्टासन का स्पर्श नहीं किया, तथापि वह सचरित्र थे। गोविन्दचन्द्र सर्वदा संसार को लेकर व्यस्त रहते थे। न तो समय में आहार होता या और न समय में निद्रा होती थी। प्रात: काल चौपाल में आते, एक दो बजे के समय घर में प्राय कर खानाहार करते। आहारान्त में फिर तटाटान (तक़ाज़ा) के लिये घर से निकलते। किन्तु गंगावर इन सब बातों को किमान का काम मानता था। वह सवेरे सवेरे ही खानाहार करके ग्राम के निष्कर्मा लोगों के संग तास पीटता और वही टीपटाप मे समय संहार करता। गुप तो यह था, पर यदि इस्के कोई वस्तु 'दो' कहने पर वह वस्तु घर से न मिले, तो माता के प्रति क्रोध बड़ी बहन के प्रति क्रोध, दास दासियों के प्रति क्रोध होता था। सब जने गंगाधर को बाबू कहते थे, और सब सनेही गंगाधर बाबू के भय से भीत रहते थे। ज्येष्ठ भ्राता गंगाधर को बहुत प्यार करता था। उसकी आखों में गंगाधर का दोष दोषरूप में नहीं बोध होता था। गोविन्दचन्द्र की पत्नी अत्यन्त साधुशीला थी। इसका वय:क्रम विंशति वत्सर था,