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पृष्ठ:बिहारी-सतसई.djvu/२६७

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सटीक : बेनीपुरी
 

रहा है। (निस्संदेह तुम उस कबूतर के मालिक छैल-छबीले विलासी पर आसक्त हो, तभी तो उसके गिरहबाज कबूतर को देखते ही उसकी याद में तुम ऐसी चेष्टाएँ दिखा रही हो!)

कारे बरन डरावने कत आवत इहिं गेह।
कै वा लखी सखी लखैं लगै थरहरी देह॥६१४॥

अन्वय—कारे बरन डरावने इहिं गेह कत आवत कै वा लखी सखी लखैं देह थरहरी लगै।

बरन=रंग। कत=क्यों। गेह=घर। कै=कई बार। लखी=देखा। थरहरी लगै=थरथरी या कँपकँपी होती है।

(यह) काले रंग का डरावना मनुष्य (श्रीकृष्ण) इस घर में क्यों आता है? मैं इसे कई बार देख चुकी हूँ, और हे सखी! इसे देखते ही मेरी देह में थरथरी लग जाती है—मैं डर से थरथर काँपने लगती हूँ।

और सबै हरषी हँसति गावति भरी उछाह।
तुहीं वह बिलखो फिरै क्यौं देवर कैं व्याह॥६१५॥

अन्वय—और सबै हरषी हँसति उछाह-भरी गावति देवर कैं ब्याह बहू तुहीं क्यौं बिलखी फिरै।

उछाह=उत्साह। बिलखी=व्याकुल।

और सब स्त्रियाँ तो प्रसन्न हुई हँसती हैं और उत्साह में भरी गीत गा रही हैं। किन्तु देवर के ब्याह में, है बहू! तू ही क्यों व्याकुल हुई फिरती हो?

नोट—देवर पर भौजाई अनुरक्त हैं। अब यह सोचकर, कि देवरानी के आते ही मुझपर देवर का ध्यान न रहेगा, यह व्याकुल है।

रबि बंदौं कर जोरि ए सुनत स्याम के बैन।
भए हँसौंहैं सबनु के अति अनखौंहैं नैन॥६१६॥

अन्वय—कर जोरि रबि बंदौं ए स्याम के बैन सुनत सबनु के अति अनखौंहैं नैन हँसौंहैं भए।

बंदौं=प्रणाम करो। हँसौंहैं=हास्यपूर्ण। अनखौंहैं=क्रुद्ध।