पृष्ठ:बिहारी बिहार.pdf/१५९

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' बिहारीविहार ।।

  • हियरो करि डायो ॥ सीधी तजि कै बान भई टेढ़ेपन की निधि । इती

अनख दुई हाय सुकवि धौं कहा लख्यो विधि ॥ ३०६ ॥ ।। । । पुनः बतरसलालच लाल की मुरली धरी लुकाय । | सौंह करै भैहनि हँसै देन कहै नटि जाय ॥ २५४ ॥ देन कहै नटि जाय फेर मुलकति ललचावति । कछुक कछुक दिखराय फेर अँचरान छिपावति ॥ झूमि झुमाय ठठोली कै कीनो मोहन बस । भूलि

  • गई धन धाम सुकवि राची तिय चतरस ॥ ३०७ ॥ . . . .

| देन कहै नटि जाये बाँसुरी लै लचकावति । उझकि झुमाय घुमाय ऍचि, अँचरान छिपावति ॥ छीनाछीनी करत गोपिका भई प्रेमबस । सुकबि आप क भूल गई परि हरि के बतरस ॥ ३०८ ॥ गुड़ी उड़ी लखि लाल की आँगन आँगन माँह। बौरी ल दौरी फिरे छुवति छबीली छाँह ॥ २५५ ।। छुवति छवीली छाँह तिया तन मन धन भूली । मुलकि मुलकि कै पुलकि रही अँगअगन फूली ॥ होइ रोमञ्चित बञ्चित सी दृग फेरि रही सखि । उड़ी उड़ी सी फिराति सुकवि वह गुड़ी उड़ी लखि ॥ ३०६ ।। लखि गुरुजनबिच कमल सौं सीस.छुवायो स्याम*। | हरिसम्मुख करि आरसी हिये लगाई बाम * ॥ २५६ ॥ हिये लगाई चाम आरसी हरिसंमुख कै । मनिथम्भ हिँ अलिङ्गि रहे हरि लालच दृग दैः ॥ तच राधा विकस्यो सरसिज लै सँदि दियो सखि + । हरि लिलार छै रहे। सकवि यह कोउ न सक्यो लखि ॥ ३१० ॥

  • क्षमा मागौ। *'तुम मेरे हृदय में हो। * कव मेल होगा। + रात को ? ||धन्यभाग ॥