पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/११८

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( १०५ ) आजीवक ने महात्मा गौतम बुद्ध के इस वचन को सुनकर कहा कि-"यह संभव है, पर भगवन् ! यह वो बताइए कि आप कहाँ जा रहे हैं।" आजीवक के प्रश्न पर गौतम बुद्ध ने कहा- वाराणसी गमिष्यामि गत्वा वै काशिका पुरीं । धर्मचक्र प्रवर्तिप्ये लोकेखप्रतिवर्तितम् ॥ अर्थात् मैं काशी जाता हूँ और वहाँ जाकर मैं वर्मचक्र का प्रचार करूँगा । यह वह धर्मचक्र होगा जिसे कोई फिर उलट नहीं सकता। आजीवक तो उनकी यह बात सुन दक्षिण को चला गया और .. महात्मा गौतम बुद्ध गया में आए । गया में वे नागराज सुदर्शन के . अतिथि रहे । नागराज ने उनकी पूजा अन्न-वस्त्र से की और वे रात भर वहाँ रहकर प्रातःकाल काशी को रवाना हुए । दूसरे दिन । वे रोहितवस्तु में, तीसरे दिन अनाल नामक गाँव में और चौथे दिन साथिपुर में ठहरे । उन स्थानों के लोगों ने उनका । भिक्षा-प्रदान से किया। सारथिपुर से चलकर वे गंगा जी के। पर पहुँचे । वर्षा के कारण गंगा जी बढ़ी हुई थीं। वहाँ मल्लाह उनसे उतरवाई माँगी, पर उनके पास था ही क्या जो वे उसे." निदान मल्लाह ने उन्हें उतारने से इन्कार किया। दृढ़ववं गंगा को विना नाव के ही पारकर काशी में पहुंचे और भिक्षा कर वे काशी से ऋषिपतन के जंगल की ओर चले।' सोयं दृढ़प्रतिज्ञो वाराणसीमुपगतो मृगदावम् । चक्र हनुत्तरमसौप्रपतयिताह्यदमुतःश्रीमान् ॥ .