पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१२६

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( ११३ ) मुझ में चक्षु, ज्ञान, प्रज्ञा, विद्या और आलोक उत्पन्न हुए। हे भिक्षुओ ! मैंने इस दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा नामक आळ- सत्य की भावना कर ली। यह पहले धमा में नहीं सुनी गई थी। इससे मुझ में चतु, ज्ञान, प्रज्ञा, विद्या और आलोक उत्पन्न हुए। हे भिक्षु ओ ! जब तक इन चारों आर्या-सत्यों का जो विप्र- वर्तित होकर द्वादशाकार हैं, मुझे यथाभूत सुविशुद्ध ज्ञान-दर्शन नहीं हुआ था, तब तक मैंने न देवलोक में न मारलोक में, न श्रमण और ब्राह्मणीय प्रजा में और न देव और मनुष्यों में यह स्पष्ट कहा था कि मुझे अनुत्तर सम्यक् संवोधि प्राप्त हुई और मैं अभिसंबुद्ध हुआ हूँ। हे भिक्षु गण ! जिस समय से मुझे इन चारों आर्य- सत्यों का जो त्रिप्रवर्तित होकर द्वादशाकार हैं, यथाभूत सुविशुद्ध ज्ञान-दर्शन हुआ, तब से मैंने देवलोक में, मारलोक में, श्रमण और ब्राह्मणीय प्रजा में, देवों और मनुष्यों में यह प्रकट किया कि मुझे अनुत्तर सम्यक् संबोधि हुई और मैं अभिसंबुद्ध हुआ, मुझ में ज्ञान और दर्शन उत्पन्न हुए, मेरा चित्त निर्विकार और विमुक्त हुआ। अब मेरा अंतिम पुनर्भव न होगा।" ___ यह उपदेश सुन कौडिन्य ने सब से पहले महात्मा बुद्धदेव के धर्म को खीकार किया। इस प्रकार पाँच दिन तक लगातार रात के समय उपदेश सुनकर धीरे धीरे क्रमशः वप, भद्रिय, महानाम और अश्वजित् ने भी महात्मा बुद्धदेव का धर्म स्वीकार किया और सव को भगवान् ने परित्राव्य ग्रहण करा यह उपदेश किया-"खाखा-- तो धम्मो । चरत ब्रह्मचरियं सम्मादुक्खसंत किरियायाति याव तेसं