पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१२७

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आयुस्मन्तानं उपसम्पदा अहोसि ।” अर्थात् धर्म स्वयं ख्यात है।समस्त दुःखों का नाश करने के लिये जब तक तुम्हें उपसम्पदा कीप्राप्ति न हो, ब्रह्मचर्य पालन करो। ...