पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१२८

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(१४).प्रथम चातुर्मास्य कौंडिन्य प्रथमं कृत्वा पंचकाचैव भिक्षवः । पष्टीनां देवकाटीनां धर्मचक्षुर्वि शोधितम् ॥ पंचवर्गी भिक्षुओं को धर्मचक्र का उपदेश कर उन्हें अपने धर्म की दीक्षा दे गौतम बुद्ध वर्षा ऋतु के आ जाने से तीन मास पर्यत काशी के ऋपिपतन नामक वन में पंचवर्गीय भिक्षुओं के आश्रम में रहे। वे नित्य अपने शिष्यों के साथ नगर में मिक्षा कर भोजन करते और आश्रम में धर्म का उपदेश करते रहे। ___ पंचवर्गीय भिक्षुओं की दीक्षा हो जाने पर असित देवल का भागिनेय नालक वा नारद यहीं श्राकर भगवान् की शरण में पहुंचा। भगवान् बुद्ध ने उसे धर्म का उपदेश कर मौन व्रत का उपदेश दिया । नालक भगवान् का उपदेश ग्रहण कर मौनी हो गया । .. __ इसी बीच में काशी के एक समृद्धशाली सेठ को जिसका नाम यश था, वैराग्य उत्पन्न हुआ। महावग्ग में लिखा है कि यश धड़ा श्रीसम्पन्न था। उसके तीन अद्भुत प्रासाद थे जिनमें वह जाड़े, गर्मी और वर्षा में अपना जीवन बड़े आनंद से विताया करता था। एक दिन यश अपने वर्षा ऋतु के प्रासाद में था और दिन रात अपने मित्रोंके साथ नाच रंग में लगा रहा। अधिक रात बीतने पर सब लोग थककर इतस्ततः पड़कर निद्रा के वशीभूत हो गए। उस समय उसे संसार की असारता का ज्ञान हुआ और वैराग्य उत्पन्न हुा । यश ने अपने प्रासाद से निकलकर मृगदाव की राह ली।