पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१४७

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१३४ ) कालउदायी महाराज शुद्धोदन से शपथ करके कपिलवस्तु से विदा हुश्रा और थोड़े ही दिनों में अपने साथियों समेत राजगृह में पहुँचा। भगवान बुद्धदेव का प्रथम चातुर्मास्य राजगृह में समाप्त हो चुका था और वे वेणुवन में भिक्षुसंघ में बैठे लोगों को उपदेश कर रहे थे। भगवान के उपदेशों को सुन कालउदायी पर, उनका इतना प्रभाव पड़ा कि वह विवश हो उनके धर्म को स्वीकार कर भितु बन अपने साथियों समेत अन्यों की भाँति संघ में रहने लगा। थोड़े दिनों के बाद हेमंत ऋतु का भी अंत हो गया और पसंत ऋतु के आगमन से प्रकृति में अद्भुत परिवर्तन प्रारंभ हुआ। एक दिन कालउदायो ने भगवान् बुद्धदेव से निवेदन किया- " भगवन् ! भिक्षाओं को सदा एक स्थान पर न रहना चाहिए। बहुत दिनों तक एक स्थान में रहने से उनमें रागादि दोपों के उत्पन्न होने को संभावना है। भिक्षुओं को वर्षा ऋतु के अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में पर्यटन करने की आवश्यकता है। अतः यदि अनुचित न हो तो भगवान् इस ऋतु में भिक्षुसंघ के साथ देशाटन के लिये निकलें। अच्छा हो, यदि संघ के लोगों के साथ भगवान् कपिल- वस्तु की ओर पधारें और महाराज शुद्धोदन को जो आपके वियोग में अत्यंत क्षीण हो गए हैं, शांति प्रदान करें।" भगवान बुद्धदेव को कालउदायी की बात अच्छी लगी और वे अपने संघ समेत राजगृह से कपिलवस्तु को प्रस्थित हुए। .. . ____दो महोने लगातार चलकर भगवान् बुद्धदेव अपने रिक्ष- संघ समेत कपिलवस्तु में पहुंचे और कपिलवस्तु के पास न्यग्रोध-