पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/१४९

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किए हाथ में भिक्षापात्र लिए देखकर रोने लगे । चारों और हाहाकार मच गया कि आज सिद्धार्थकुमार कपिलवस्तु में भगवा वस्त्र धारण कर भिक्षा पात्र लिए घर घर भिक्षा माँग रहे हैं। यह समाचार राजमहल में पहुँचा । गोपा कुमार को. भीख माँगते देख ढाढ़ मारकर रोने लगी। वह अपने ससुर महाराज शुद्धोदन • के पास दौड़ी हुई गई और बोली- " अत्यंत लज्जा की बात है कि कपिलवस्तु में आकर भी आर्यपुत्र को घर घर भिक्षा माँगनी पड़े।" महाराज शुद्धोदन नंगे पैर दौड़े हुएभगवान् बुद्धदेव के पास पहुंचे और आँखों में आँसू भरकर कुमार से बोले- हे वत्स। तुम क्यों द्वार द्वार भिक्षा माँगकर मुझे लज्जित करते हो ? क्या तुमने यह समझा है कि मैं तुमको और तुम्हारे संघ को भोजन न दे सकूँगा ?" तथा- गत ने शुद्धोदन की बात सुनकर कहा--" महाराज ! यह हमारा कुलधर्म है " । शुद्धोंदन कुमार की बात सुन अत्यंत विस्मित हुए और भौचक होकर बोले-" कुमार ! हम क्षत्रिय राजवंश में उत्पन्न हुए हैं। हमारे कुल में कभी किसी ने भिक्षा नहीं माँगी।" बुद्ध ने पिता की यह बात सुनकर कहां-" महाराज, मैं तो राज- वंश में नहीं हूँ । मैं तो बुद्धों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ। वे ही हमारे पूर्व पुरुष हैं। बुद्ध लोग सदा से भिक्षा माँगकर ही अपना भरण पोपण करते आए हैं और यही भिक्षावृत्ति उनका कुलधर्म है । उसी कुलधर्म के अनुसार मैं भी द्वार द्वार भिक्षा माँगता फिरता हूँ। हे पिता ! यदि किसी के पुत्र को कहीं कोई गुप्त निधि मिल जाय; तो इसका एकांत कर्तव्य है कि वह उस निधि में से सर्वोत्कृष्ट रत्न पिता के