पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/२१४

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(२०१ ) अनित्यता न नगर-धर्म है, न प्राम-धर्म है और न यह किसी कुल का धर्म है, किन्तु सब मनुष्यों और देवताओं का यही स्वभाव है कि चे एक न एक दिन मरेंगे। ___ कृपा गोतमी अपने पुत्र को श्मशान में फेंककर गौतम बुद्ध के पास गई । बुद्धदेव ने उसे देखकर पूछा-"गोतमी ! सरसों लाई ?" गोतमी ने उत्तर दिया-"महाराज ! अब मुझे सरसों की आवश्यकता नहीं है, मेरा चित्त अब स्वस्थ है। " भगवान बुद्धदेव. ने गोचमी को यह बात सुन उससे कहा- "हे गोतमी ! पुत्र और पशु में आसक्त मनुष्यों पर मृत्यु उसी प्रकार आक्रमण करती है जैसे- रात को गाँवों में जल-प्रवाह आकर सोए हुए लोगों को वहा ले जाता है । जब किसी की मृत्यु आ जाती है, तब न उसके पुत्र न पिता और न बंधु उसे बचा सकते हैं। शीलवान् पंडितगण इसे जान कर अपने लिये निर्वाण का मार्ग साफ करते हैं।" गोतमी को महात्मा बुद्धदेव का उपदेश सुन ज्ञान हो गया। उसने उनसे प्रत्रया और उपसंपदा ग्रहण करने की इच्छा प्रकट की और भगवान् बुद्धदेव ने उसे प्रत्रया और उपसंपदा प्रदान की। गोतमी प्रवव्या लेते समय बड़े हर्ष से यह गाथा गाने लगी- पेमतो जायतो सोको पेमतो जायतो भयम् । पेमतो विप्पमुत्तस्स नत्यि सोको कुतो भयम्॥ अर्थात् प्रेम से ही शोक होता है, प्रेम से ही भय होता है। जो प्रेम से विमुक्त है, उसे शोक नहीं है और फिर मय कहाँ।