पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/८६

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.. (E) तपश्चर्या सूर्य्यस्य लोके न सहायकृत्यं चन्द्रस्य सिंहस्य च चक्रवर्तिनः। योधौ निपएणस्य च निश्चितस्य न बोधिसत्वय सहायकृत्यम् ॥ गौतम राजगृह से पंच-भद्रवर्गीय ब्रह्मचारियों के साथ चल कर भैक्ष्यचर्या करते हुए कई दिन में गया पहुंचे। उस समय गय- शीर्ष पर्वत पर कोई बड़ा उत्सव मनाया जा रहा था । उत्सव के प्रधान अधिष्ठाता ने उसमें गौतम बुद्ध को भी पंच-भद्रवर्गीय ब्रह्म- चारियों के साथ निमंत्रित किया। गौतम भी निमंत्रण पा उस उत्सव में सम्मिलित हुए और अधिष्ठाता ने भोजन और वस्त्र से उनकी पूजा की । गौतम वहाँ गयशीर्ष पर्वत पर ठहर गए और मैक्ष्यचर्या करते हुए वहाँ रहने लगे। उस समय उनके चित्त में नाना प्रकार के साधुओं को देख यह विचार आया कि तीव्र, मृदु और मध्य भेद से साधुओं की तीन कोटियाँ हो सकती हैं । इन साधुओं में कुछ लोग तो ऐसे हैं जो काम-सुख में बार बार निमग्न होते हुए विशुद्धबोधि की प्राप्ति की कामना रखते हैं। उनका प्रयत्न ठीक उसी प्रकार का है जैसे कोई पुरुप गीली अरणी को वार वार जल में भिगोकर उसे मथकर अग्नि निकालना चाहता है। ऐसे लोगों को जिनका चित्त काम-सुख के राग से रंजित है, वोधि प्राप्त होना असंभव है। दूसरे ऐसे लोग हैं जिनका चित्तं कभी काम-भोग