पृष्ठ:बुद्धदेव.djvu/९८

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डॉलने चाहे थे। फिर जब उन्होंने उरुविल्व में छः वर्ष तक घोर तप किया, तब भी उनसे कई बार उसने कहा कि " तू क्यों शरीर सुखाता है ? तू दुर्बल हो गया है। अब तू मर जायगा । उठ, तू अपने घर जा । तू राजपुत्र है। तुझे राज्य-ऐश्वर्या भोगना चाहिए, न कि देह सुखाना ।" पर गौतम ने उसका तिरस्कार ही किया। अंत में जब गौतम बोधिमूल में अटल समाधि लगाने के लिये कुशासन पर आसन लगाकर वैठे, तव मार को भय हुआ कि अव मेरी गति का अवरोध हो जायगा। उसने अपने पुत्रों और पुत्रियों की सम्मति ली और सब ने उसे मना किया; पर दैववश उसने किसी की न सुनी और अपनी सारी सेना को एकत्र किया और वह अपने समस्त पुत्रों और पुत्रियों को संग ले हाथ में पुष्पधनु ग्रहण कर पाँच वाण लिए वोधिमूल के पास आया। पहले उसने रति-प्रीति आदि को विघ्न डालने के लिये गौतम के पास भेजा । उन लोगों ने वारी वारी से उनके पास आकर उन्हें फुसलाना चाहा; और जव गौतम उनके फुसलाने में न आए, तव मार ने अपनी सेना से अनेक प्रकार के विघ्न डलवाने चाहे । वे लोग नाना प्रकार के भयानक रौद्र रूप धारण कर उन्हें भयभीत करते थे । वायु तेज़ चली, पानी वरसा, विजली चमकी, तड़पी और गिरी, पेड़ उखड़ गए, तूफान आया, सब कुछ भौतिक उत्पात हुए, पर इससे न तो वोधि वृक्ष का एक पत्ता ही हिला और न गौतम ही अपने आसन से डिगे । अब मार ने.एक और माया रची। उसने वहुतेरी अप्सराओं को भेजा जो अत्यंत रूपयौवन-संपन्न होने पर भी उनके चारों ओर नंगी