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पृष्ठ:भट्ट-निबन्धावली.djvu/१०७

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विशाल वाटिका आवृत है, जहाँ पहुँच बाग के सैलानी को इस श्लोक के भावार्थ ,' का भरपूर अनुभव होता है- "एनपुष्पफजलपरीः कदाप्यदृष्टं वृत च खलु शूकै ।

- उपसम भवन्त वद बबुर कस्म लेभिन ॥

.. इम क्यारी का सब गाटे का गारा कंटकावृत होने से निकम्मा .' 'हो रहा है । जहाँ कहीं कोई पेड़ भी है तो विषफल उसमे फलते हैं, - जिसके खानेवालों को रग-रग मे उन फलों का असर बैर-फूट परस्पर की स्पर्द्धा, ईर्ष्या, द्रोह, मद, मात्सय के सिवाय और कुछ वहाँ हई नहीं। इन फूलों की तीखी माक और इसके फल का कडुया रस दूर- -दूर तक इस सपूर्ण वाटिका में ऐसा व्याप गया है कि समस्त गुण- . . रजित होने पर भी यहाँ के पेड़ केवल फूट के कारण नहीं फरकते। इस गाटे की धरती मे एक अनोखी वात देखने में आई । ईसाइयों की धर्मपुस्तक में लिखा है कि खुदा ने आदम को ज्ञान के पेड़ का फल खाने को मना किया था, पर इसके विरुद्ध यहाँ अज्ञान का वृक्ष न जानिये कहीं से उग पाया है कि जिसने अज्ञान के फल को चक्खा उसमे विज्ञता-संपादन की यावत् चेष्टा और प्रयत्न सव व्यर्थ होता है। प्रिय पाठक ! इस बाग के सैतानी बनते हो तो सावधान रहो, दाचित हो हमारी बात पर ध्यान दो। ऐसी न जानिये कितनी क्यारियां इसमे हैं, उनकी ओर न मुक पड़ना । ऐसा न हो कि उन विषैले फलों का हवा तुम्हे लग जाय और तुम इन फलों के खानेवालों के साथी बन जाप्रो । लो श्रागे चलो, देखो ये कैसी मनोहर क्यारियां है। इसके अनगिनत पेड़ फूल और फलो र लदे लहलहाते हुये कैसी शोभा दे रहे हैं । इसके , फूल-फत उन्हीं को सुलभ हैं जो परिश्रमी, दृढ़सकल्प और उद्यमी हैं, जिनने इतना सा स है कि काम पड़ने पर ' असीम महासागर और दुर्गम खाड़ियों को “गोषपद' गऊ के खुर के समान पार कर डालते हैं। "किं दूरं व्यवसायिनाम्। १ इनका कला-