पृष्ठ:भट्ट-निबन्धावली.djvu/१२१

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रस में फीकापन कव आता है १०५ मालूम पड़ने लगी, किसी मे कहीं रस नहीं मिलता; जिन्दगी का दिन भरना पड़ा। कौड़ी-कौड़ी जमा करते रहे, पेट भर अन्न न खाया, फटा-पुराना, मैला-कुचैला कपड़ा पहिन किसी तरह तन ढाप अत्यन्त कदयतापूर्वक पारकर लाखों जमा किया, एकान्त म बैठ जव उन रुपयों को गिनता है, अानन्द मे मग्न फूला नही समाता; अपने मे भाग्यमानी की सीमा मानता है। अकस्मात, कोई ऐसा ईश्वर का कोप हुया कि चोर सेध लगाय सब धन चुरा ले गये, या कोई दूसरा धक्का लगा कि सब का सव गायब हो गया। उस समय इस कृपण के जी से पूछना चाहिये जिसे यह जगत जीणं अरण्य-सा बोध होता है; केवल प्राणमात्र शरीर से जुदा नहीं होता और सब-सब दशा इस कदर्य की हो जाती है। ___ऊँचे कुल में जन्म है, सामान्य रीति पर अमन-वसन खाना-पीना अच्छी तरह पर निमता जाता है, किसी बात को मोहताजगी नहीं है, परिवार भर मे बड़ी साहुत और एका है, बाहर शिष्टाचार मे बात सब भॉति वनी है, दस भले आदमियो में कदर है। पण्डित जी, लाला जी, शाह जी, जो हों, समाज में अगुवा सरपञ्च और सिरताजे । समझे जाते है पर घर में स्त्री ऐसी कुकाला, कलहकारिणी, कुभार्या आई कि हवा से लड़ती है, घर भर का नथुनों में प्राण प्रा लगा।' कुनबा भर के आदमियों को तोड़-फोउ अलग कर दिया ऐसा विद्रोह फैला कि प्रत्येक के मन में गांठ पड गई, जो कुछ एका था कि बँधी मूठी रहने से फूटी-श्राजी कोई नहीं जानता था, भण्डाढ हो गई, सब भरम खुल गया । लाना जो के भीतर को चाट भीतर हो सालती है, जिन्दगी वेमजे हो गई- सच है-"जन्म नष्टं कुभार्यया ।" "घर के लोगवा यों कहैं मियों जियें घर मरकत है। मियों की गत मिथें जाने सांस लेत जी सरकत है।"