ही मौर्यकुल में लक्ष्मी और धर्म स्थापना करनेवाले, आर्य चाणक्य से कहो---
राक्षस---( आप ही आप) हाय! यह भी राक्षस को सुनना लिखा था!
१ चांडाल---कि आप की नीति ने जिसकी बुद्धि को घेर लिया है, वह अमात्य राक्षस पकड़ा गया।
( परदे में सब शरीर छिपाए केवल मुँह खोले चाणक्य आता है )
चाणक्य---अरे कहो, कहो।
किन जिन बसननि मैं धरी कठिन अगिनि की ज्वाल?
रोकी किन गति वायु की डोरिन ही के जाल?
किन गजपति-मईन प्रबल सिंह पींजरा दीन?
किन केवल निज बाहु-बल पार समुद्रहि कीन?
१ चांडाल---परमनीतिनिपुण आप ही ने तो।
चाणक्य---अजी! ऐसा मत कहो, वरन् "नंदकुलद्वेषी देने" यह कहो।
राक्षस---( देखकर आप ही आप ) अरे! क्या यही दुरात्मा पा महात्मा कौटिल्य है?
<poem>
सागर जिमि बड्ड रत्नमय तिमि सब गुन की खानि। तोष होत नहिं देखि गुन बैरी हू निज जानि॥
चाणक्य---( देखकर ) अरे! यही अमात्य राक्षस हैं?
जिस महात्मा ने----