पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/६१

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उसके मन में ईश्वर की सर्वव्यापकता आदि के संबंध में उदात्त विचार आने लगते और ऐसे उद्‌गार निकलते थे कि अहाह! परमेश्वर की लीला कैसी अदभुत है! यह अरण्य स्वभावतः भयानक होता है, परंतु इस समय यह कितना मनोहर मालूम होता है। धन्य है प्रभु, धन्य है तुम्हारी कृति! कई लोग मन में समझते होंगे कि इस अरण्य से क्या लाभ है? परन्तु वास्तव में उसकी सुन्दरता और रमणीयता में उतना महत्व नहीं है जितना उसकी उपयोगिता में है। सैकड़ों नदियाँ यहाँ से उत्पन्न होकर नीचे बहती हैं जिनसे प्राणियों को केवल पानी ही का लाभ होता है, किन्तु उनके द्वारा कई देशों की फसल पकती है और मनुष्यों का व्यापार चलता है। यह अरण्य असंख्य प्राणियों का आश्रय-स्थान और अन्न-भंडार है। विविध वनस्पतियों से संयुक्त होकर मनुष्यों की व्याधि दूर करता है। सारांश, यह सब तरह से अच्छा और परोपकारी जान पड़ता है। परन्तु खेद का विषय है कि मनुष्य-जैसा दुष्ट, अधम, अनाचारी प्राणी इस जगत में कोई भी न होगा। जितने दुर्गुण हैं, वे सब उसी में भरे हैं। नदियों की उद्दाम बाढ़, विद्युल्लता, भूकंप और प्रचंड वायु तथा ज्वालामुखी पर्वत से एक बार जगत् का हित होना संभावित है, परन्तु मनुष्यों से नहीं हो सकता। हाय! हाय! जिसके दृष्ट कृत्यों से न्यायस्वरूप परमात्मा के कार्य को कलंक-सा लग जाता है, ऐसे मनुष्य-वर्ग में क्यों कर मैंने जन्म पाया। यदि मनुष्य में ये दुर्गुण न होते तो निःसंदेह यह संसार निष्कलंक हो जाता। परमेश्वर जैसा परम दयालु और न्यायी है, उसी प्रकार उसका बनाया जगत् भी होना चाहिये। हे सर्वसाक्षी! दयालय! जगदीश! मुझ दीन को ऐसे अज्ञान और नैराश्य सागर के संशय-रूपी भँवर में क्योंकर डाल रक्खा है? मेरी ओर तनिक कृपा की दृष्टि से देखो––ऐसा कहते-कहते एक समय आजम उस सुन्दर सरोवर के तट पर पहुँचा और यह सोचकर कि