पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१६१

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माजसपर नादिर-नहीं लैला, ईशन के लोग इतने कमीने नहीं हैं कि अपने बादशाह पर तलवार उठायें। लैला-पहले मैं भी यही समली थी। सवारों ने समीप आकर घोड़े रोक लिये और उतरकर बड़े अदव से नादिर को सलाम किया। नादिर बहुत जब्त करने पर भी अपने मनोवेग को न रोक सका, दौड़कर उनके गले से लिपट गया। वह अन गादशाह न था, ईशन का एक मुसाफिर था। बादशाहत मिट गई थी, पर देशानियत रोमोम में भरी हुई थी। वे तीनों भादमी इस समय ईरान के विधाता थे। इन्हें वह पहचानता था । उनको स्वामि- भक्ति की कई बार परीक्षा ले चुका था। उन्हें लाकर अपने शेश्यि पर बैठाना चाहा, लेकिन वे जमीन ही पर बैठे। उनकी दृष्टि में वह बोरिया इस समय सिंहासन था, जिस पर अपने स्वामी के सम्मुख वे कदम न रख सकते थे । मातें होने लगी । ईरान की दशा अत्यन्त शोचनीय था। लूट-मार छा घामाद गर्म था, न कोई व्यवस्था थी, न व्यवस्थापक थे। अगर यहो दशा रही तो शायद बहुत जल्द उसको गरदन में पराधीनता का जुआ पड़ जाय । देश अब नादिर को ढूंढ़ रहा या । उसके सिवा कोई दुसरा उस डूबते हुए बेड़े को न पार लगा सक्षता था। इसी आशा से ये लोग उसके पास आये थे। नादिर ने विरक भाव से महा-एक पार इज्जत लो, क्या अबकी जान लेने को सोची है ? मैं पड़े आराम से हूँ। आप मुझे दिक्क न करें। सरदारों ने भाग्रह करना शुरू किया--हम हुजूर का दामन न छोड़ेंगे, यही अपनी गरदनों पर छुरी फेरसर हुजूर के कदमों पर जान दे देंगे। जिन बदमाशों ने आपको परेशान किया था, अब,उनका नहीं निशान भी न रहा, हम लोग उन्हें फिर कभी सिर न उठाने देंगे, सिर्फ हुजूर छौ माह चाहिए । नादिर ने पात काटकर कहा- साहयो, अपर आप मुझे इस इरादे से ईशन का बादशाह बनाना चाहते हैं, तो माझ रखिए । मैंने इस सफर में रिआया को हालत का गौर से मुसाहज़ा किया है, और इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि सगी मुल्लों में उनको हालत खराब है। वे रहम के कानिक हैं। ईरान में मुझे कभी ऐसे मौके न मिले थे। मैं रिया को अपने दस्वारियों की आंखों से देखता था । मुम्मसे आप लोग यह उम्मीद न रखें कि रिभाषा को लूटकर भापडी जे भरूंगा। यह अाप अपनी 3