पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१६२

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१६१ गरदन पर नहीं ले पाता । मैं इ साफ़ का मोजान बराबर र गा और इसी शर्त पर ईरान चल सकता हूँ। लैला ने मुसकिराकर कहा-तुम रिआया का कसूर माफ कर सकते हो, क्योंकि उसकी तुमसे कोई दुश्मनी न थी। उपके दांत तो मुझ पर थे। मैं उसे केसे माफ कर सकतो हूँ? नादिर ने गम्भीर भाव से कहा- लैला, मुझे यकीन नहीं आता कि तुम्हारे मुँह से ऐसी बातें सुन रहा हूँ। लोगों ने समम्मा, अभी इन्हें भड़काने को जरुरत हो क्या है। ईरान में चलकर देखा नायगा । दो-चार मुखबिरों से रिआया के नाम पर ऐसे उपद्रव खड़े करा देंगे कि इनके ये सारे खयाल पट जायेंगे। एक सरदार ने अर्ज को-माजल्लाह ! हुजूर यह क्या फरमाते हैं ? क्या हम इतने नादान हैं कि हुजूर को इ साफ के रास्ते से हटाना चाहेंगे ? ईसाफ़ हो बादशाह का जौहर है ओर हमारो दिली आरज् है कि आपका इ साफ नौशेरवां को भी शमिन्दा कर दे। हमारी मशा सिर्फ यह थी कि आइन्या से हम रिया को कभी ऐसा मौका न देंगे कि वह हुजूर को शान में वेअदली कर सके । हम अपनी जाने हुजूर पर निसार करने के लिए हाजिर रहेंगे। सहसा ऐसा मालूम हुआ कि सारो प्रकृति सङ्गोतमय हो गई है। पर्वत और वृक्ष, 'तारे और चांद, वायु और जल, सभो एक स्वर से गाने लगे, चांदनी की निर्मल छटा में, वायु के नीख प्रवाह में सगोत को तरगे उठने लाएँ। लैला अपना डन मजा-वजाकर गा रही थी। आज मालूम हुआ, ध्वनि हो सृष्टि का मूल है। पर्वतों पर देवियों निकल निकलकर नाचने लगो, आकाश पर देवता नृत्य करने लगे। सजोत ने एक नया ससार रच डाला। उसी दिन से जब कि प्रजा ने राजभवन के द्वार पर उपद्रव मचाया था और लैला के निर्वासन पर आग्रह किया था, लैला के विचारों में शान्ति हो गई थी। जन्म ही से उसने जनता के साथ सहानुभूति करना सोखा था। वह राजकर्मचारियों को प्रना पर अत्याचार करते देखती थी और उसका कोमल हृदय तप उठता था। तम धन, ऐश्वय और विलास से उसे घृणा होने लगतो थी, जिसके कारण प्रजा को इतने कष्ट भोगने पड़ते हैं। वह अपने में किसी ऐसी शक्ति का आह्वान करना चाहती थी जो आततायियों के हृदय में दया और प्रजा के हृदय में अभय का सञ्चार करे,