पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१६३

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१६२ मानसरोवर . उसकी बाल-कल्पना उसे एक सिहासन पर बिठा देतो, जहाँ वह अपनी न्याय-नौति से संसार में युगान्तर उपस्थित कर देती। कितनी रात उसने यही स्वप्न देखने में काटी थीं। कितनी हो बार वह अन्याय-पीड़ितों के सिरहाने बैठकर रोई थी । लेकिन अब एक दिन ऐसा आया कि उसके स्वर्ण-स्वप्न आंशिक रोति से पूरे होने लगे, तब उसे एक नया और कठोर अनुभव हुआ। उसने देखा कि प्रजा इतनी सहनशोल, इतनी दोन और दुर्वल नहीं है, जितना वह सममती थी। इसकी भपेक्षा उसमें भोपन, अविचार और अशिष्टता को मात्रा कहीं अधिक है। वह सद्व्यवहार को कद्र करना नहीं जानतो, शक्ति पाकर उसका सदुपयोग नहीं कर सकती। उसो दिन से उसका दिल जनता से फिर गया था। बिस दिन नादिर और लैला ने फिर तेहरान में पदार्पण किया, सारा नगर उनका अभिवादन करने के लिए निकल पड़ा । शहर पर आतङ्क छाया हुआ था, वारों ओर से करुण रुदन की ध्वनि सुनाई देती थी। अमोरों के मुहल्ले में श्री लोटतो फिरतो थी, परीबों के मुहल्ले उजड़े हुए थे, उन्हें देखकर कलेजा फटा जाता था। नादिर रो पहा, लेकिन लैला के ओठों पर निष्ठुर, निर्दय हास्य अपनो छटा दिखा रहा था। नादिर के सामने अब एक विकट समस्या थो। वह नित्य देखता कि मैं जो करना चाहता हूँ, वह नहीं होता और जो नहीं करना चाहता, वही होता है, और , इसका कारण सैला है, पर कुछ कह न सकता था। लैला उसके हर एक काम में हस्तक्षेप करती रहती थी। वह जनता के उपकार और उद्धार के लिए जो विधान करता, लैला उसमें कोई-न-कोई विन्न अवश्य डाल देतो, और उसे चुप रह जाने के सिवा और कुछ न सूझता। लैला के लिए उसने एक बार राज्य का त्याग कर दिया था। तब भापत्ति-काल ने लैला को परीक्षा न को यौ। इतने दिनों को विपत्ति में उसे लैला के चरित्र का जो अनुभव प्राप्त हुआ था, वह इतना सुखद, इतना मनो- हर, इतना सरस था कि वह लैला-मय हो गया था। लैला हो उसका स्वर्ग थी, उसके प्रेम में रत रहना ही उसकी परम अभिलाषा थी। इसकेला के लिए वह अब क्या कुछ न कर सकता था ? प्रजा की और साम्राज्य को उसके सामने क्या हस्ती थी। इस भाति तीन साल बीत गये, प्रजा को दशा दिन-दिन बिगड़ती हो गई। (s) एक दिन नादिर शिकार खेलने गया और साथियों से अलग होकर जाल में .