पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१८९

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मार के आगे भूत भागता 1 मुझे प्रति क्षण यह शका होती थी कि कहीं यह लोकोधि चरितार्थ न हो जाय । कहीं खानसामा खुल न पड़े। नहीं तो फिर मेरी खैर नहीं। सनद छिन जाने का, चोरी का मुकदमा चल जाने का, अपवा जज साहब से तिरस्कृत किये जाने का इतना भय न था, जितना साहप के पदाघात को लक्ष्य बनने का। नालिस हंटर लेकर दौड़ न पड़े। यो में इतना दुर्बल नही हूँ, हृष्ट-पुष्ट और साहसी मनुष्य हूँ। कालेज में खेल-कूद के लिए पारितोषिक पा चुका है। अब भी बरसात में दो महीने मुगदर फेर लेता हूँ। लेशिन एस समय भय के मारे मेरा पुरा हाल था। मेरे नैतिक बल का आधार पहले ही नष्ट हो चुका था। चोर में बल कहाँ ? मेरा मान, मेरा भविष्य, मेरा जोक्न खानसामा के केवल एक शब्द पर निर्भर था- केवल एक शब्द पर ! किसका जीवन-सूत्र इसना क्षीण, इतना जोर्ण, इतना जर्जर होगा! मैं मन-ही-मन प्रतिज्ञा कर रहा था- शमाथियों की तोबा नहीं, सच्ची, दृढ़ प्रतिज्ञा-कि इस सकट से बचा तो फिर शराब न पीऊँगा। मैंने अपने मन को चारों ओर से बांध रखने के लिए, उसके फुत्तों का द्वार बन्द करने के लिए एक भीषण शपथ खाई। मगर हाय रे दुर्दैव ! कोई सहाय न हुआ। न होबर्द्धनधारी ने सुध ली, न नृसिंह अगवान् ने । वे सब सत्ययुग में भाया करते थे। न प्रतिज्ञा कुछ काम आई, न शपथ का कुछ असर हुआ। मेरे भाग्य या दुर्भाग्य में जो कुछ बदा था, वह होकर रहा । निधना ने मेरी प्रतिज्ञा को सुदृढ़ रखने के लिए शपथ को यथेष्ट न समझा । खानसामा बेचारा अपनी बात का धनी था। थप्पड़ खाये, ठोकर लाई, दाढ़ी जुचदाई, पर न खुला, न खुला ! बड़ा सत्यवादो, वीर पुरुष था। मैं शायद ऐसी दशा में इतना अटल न रह सकता, शायद पहले ही थपड़ में उगल देता । उपकी और से भु जी घोर शंका हो रही थी, वह निर्मूल सिद्ध हुई। जन तक जोऊँगा, उस बारात्मा का गुणानुवाद करता रहूँगा। पर मेरे ऊपर दूसरी ही ओर से वज्रपात हुआ। C खानसामा पर जब मार-धाड़ का कुछ असर न हुआ, तो साहा उनके कान पकड़े हुए डाक बँगले की तरफ चले । मैं उन्हें आते देख चटपट सामने बरामदे में आ बैठा, और ऐसा मुंह बना लिया मानों कुछ जानता ही नहीं। साइश ने खानसामा को लाकर t